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फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे आँसुओं में भीगने के बा'द भारी हो गए

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अब नए सपने सजाना आप को शादी मुबारक रात दिन बस मुस्कुराना आप को शादी मुबारक याद करवाई थी मैं ने जो ग़ज़ल मेरी कभी वो हो सके तो भूल जाना आप को शादी मुबारक जानता हूँ मन करेगा बात करलें इक दफ़ा बस फ़ोन लेकिन मत लगाना आप को शादी मुबारक दूर अब माँ बाप से घर से हमेशा ही रहोगे वक़्त पर खा लेना खाना आप को शादी मुबारक आपसे ये इल्तिजा, मैं जब कभी टीवी पे आऊँ आप चैनल मत हटाना, आप को शादी मुबारक पूछ ले कोई सहेली क्या हुआ उस इश्क़ का तो दोष मुझ पर ही लगाना आप को शादी मुबारक आपने शादी रचाई तो मेरी उम्मीद टूटी शुक्रिया करता दीवाना आप को शादी मुबारक

Tanoj Dadhich

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मन भर गया है मुझ सेे तो दिलबर बदल कर देख लो क्या एक ही दर पर रहोगे दर बदल कर देख लो इस में तो कोई शक नहीं हैं ख़ूब-सूरत आप पर मेरी तवज्जोह चाहिए तेवर बदल कर देख लो माँ बाप पर जो बोझ है आसान लगता है तुम्हें तुम उन की ज़िम्मेदारियाँ पल भर बदल कर देख लो इन चिंदियों के आने से कुछ भी न बिगड़ा है मेरा इक और मौका है कि तुम लश्कर बदल कर देख लो ये नौकरी आकिब तुम्हारे बस की बिल्कुल भी नहीं ये इश्क़ छोड़ो यार तुम दफ़्तर बदल कर देख लो

Aqib khan

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जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से कहाँ हम ने गुज़ारी ज़िंदगी मेरे अंदर इक नया ग़म रोज़ रख जाता है कौन रफ़्ता रफ़्ता हो रही है और भारी ज़िंदगी रूह की तस्कीन के सारे दरीचे खुल गए दर्द के पहलू में जब आई हमारी ज़िंदगी सिर्फ़ थी ख़ाना-बदोशी या मोहब्बत का जुनूँ हिजरतें करता रहा इक शख़्स सारी ज़िंदगी एक लफ़्ज़-ए-कुन कहा आबाद सन्नाटे हुए आसमानों से ज़मीनों पर उतारी ज़िंदगी

Azm Shakri

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चारपाई पे आ उतारी है ज़िन्दगी ज़िंदा लाश भारी है आप दुख दे रहे है रो रहा हूँ और ये फ़िलहाल जारी है रोना लिखा गया रोते है जिम्मेदारी तो जिम्मेदारी है मेरी मर्ज़ी जहाँ भी सर्फ़ करूँ ज़िन्दगी मेरी है, तुम्हारी है दुश्मनी के हजारो दर्जे है आख़िरी दर्जा रिशतादारी है

Afkar Alvi

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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है

Munawwar Rana

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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

Rahat Indori

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यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं

Rahat Indori

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इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

Rahat Indori

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वो इक इक बात पे रोने लगा था समुंदर आबरू खोने लगा था लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी मैं आँखें खोल कर सोने लगा था चुराता हूँ अब आँखें आइनों से ख़ुदा का सामना होने लगा था वो अब आईने धोता फिर रहा है उसे चेहरे पे शक होने लगा था मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया मैं सब के सामने रोने लगा था

Rahat Indori

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ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े

Rahat Indori

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