बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ बाँस की खर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी जागी थकी दो-पहरी जैसी माँ चिड़ियों की चहकार में गूँजे राधा मोहन अली अली मुर्ग़े की आवाज़ से बजती घर की कुंडी जैसी माँ बीवी बेटी बहन पड़ोसन थोड़ी थोड़ी सी सब में दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी माँ बाँट के अपना चेहरा माथा आँखें जाने कहाँ गई फटे पुराने इक एल्बम में चंचल लड़की जैसी माँ
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परख फ़ज़ा की हवा का जिसे हिसाब भी है वो शख़्स साहब-ए-फ़न भी है कामयाब भी है जो रूप आई को अच्छा लगे वो अपना लें हमारी शख़्सियत काँटा भी है गुलाब भी है हमारा ख़ून का रिश्ता है सरहदों का नहीं हमारे ख़ून में गंगा भी है चनाब भी है हमारा दौर अँधेरों का दौर है लेकिन हमारे दौर की मुट्ठी में आफ़्ताब भी है किसी ग़रीब की रोटी पे अपना नाम न लिख किसी ग़रीब की रोटी में इंक़िलाब भी है मिरा सवाल कोई आम सा सवाल नहीं मिरा सवाल तिरी बात का जवाब भी है इसी ज़मीन पर हैं आख़िरी क़दम अपने इसी ज़मीन में बोया हुआ शबाब भी है
Kanval Ziai
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इश्क़ करने का अजी तुम में हुनर है ही नहीं इश्क़ कैसा जो उधर है और इधर है ही नहीं छोड़ कर उन को कहाँ जाएँगे इतनी रात में रह गुज़र हम सेे ख़फ़ा है और घर है ही नहीं क्या करेंगे इश्क़ कर के घर में सौ सौ काम हैं इश्क़ का क़िस्सा कहीं भी मुख़्तसर है ही नहीं नाती पोते हो चुके हैं उन के भी और मेरे भी दिल लगाने की हमारी अब उमर है ही नहीं चाँद तारे सब नज़ारे जिस के आगे कुछ नहीं पर करें क्या हम जिधर हैं वो उधर है ही नहीं रो पड़े थे आप क्यूँँ जब वो किसी के साथ थी रोना ही क्यूँँ जब के दिल में कुछ अगर है ही नहीं इश्क़ का क़िस्सा खुला घर पर सटाके वो पड़े रंग बदले खाल के असली कलर है ही नहीं देने वाले ने दिए है ज़िंदगी के चार दिन इश्क़ जिस में ता-सहर है उम्र भर है ही नहीं आप को ही हो मुबारक आप का ये मशवरा बा-हुनर है बा-असर है कार-गर है ही नहीं जिन का होना या न होना एक जैसी बात है उन की भी है ये शिकायत के कदर है ही नहीं उस ने पूछा मेरी ख़ातिर यार को छोड़ोगे तुम हम सफ़र गर हम नहीं तो रह गुज़र है ही नहीं यार हम सेे जो करा ले उन को हक हम ने दिया यारियाँ वो है जहाँ लेकिन मगर है ही नहीं आप का अहसान ठहरा आप पे भी मुझ पे भी आप मेरे हो चुके मुझ को ख़बर है ही नहीं
Gagan Bajad 'Aafat'
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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिल-ए-सफ़-ए-आवारगी नहीं लगता कभी कभी तो वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहा से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बोसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता
Tehzeeb Hafi
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ख़ुशबू की तरह आया वो तेज़ हवाओं में माँगा था जिसे हम ने दिन रात दु'आओं में तुम छत पे नहीं आए मैं घर से नहीं निकला ये चाँद बहुत भटका सावन की घटाओं में इस शहर में इक लड़की बिल्कुल है ग़ज़ल जैसी बिजली सी घटाओं में ख़ुशबू सी अदाओं में मौसम का इशारा है ख़ुश रहने दो बच्चों को मासूम मोहब्बत है फूलों की ख़ताओं में हम चाँद सितारों की राहों के मुसाफ़िर हैं हम रात चमकते हैं तारीक ख़लाओं में भगवान ही भेजेंगे चावल से भरी थाली मज़लूम परिंदों की मासूम सभाओं में दादा बड़े भोले थे सब से यही कहते थे कुछ ज़हर भी होता है अंग्रेज़ी दवाओं में
Bashir Badr
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अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला हम ने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला उस को रुख़्सत तो किया था मुझे मा'लूम न था सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला दूर के चाँद को ढूँडो न किसी आँचल में ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सब की दुनिया कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला
Nida Fazli
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दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें ज़िंदगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी रात जंगल में कोई शम्अ' जलाने से रही फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही
Nida Fazli
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
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चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं मौत इक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों का जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते चाँद तारों में जगमगाते हैं ये मुसव्विर अजीब होते हैं आप अपने हबीब होते हैं दूसरों की शबाहतें ले कर अपनी तस्वीर ही बनाते हैं यूँँ ही चलता है कारोबार-ए-जहाँ है ज़रूरी हर एक चीज़ यहाँ जिन दरख़्तों में फल नहीं आते वो जलाने के काम आते हैं
Nida Fazli
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जाने वालों से राब्ता रखना दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना घर की ता'मीर चाहे जैसी हो उस में रोने की कुछ जगह रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी है मिलने-जुलने का हौसला रखना उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस जगह पता रखना
Nida Fazli
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कभी कभी यूँँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँँ आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है उस बस्ती से छुट कर यूँँ तो हर चेहरे को याद किया जिस से थोड़ी सी अन-बन थी वो अक्सर याद आया है कोई मिला तो हाथ मिलाया कहीं गए तो बातें कीं घर से बाहर जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है
Nida Fazli
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