भले न जल्द हो ताख़ीर से मुहब्बत हो मगर जो हो तो किसी हीर से मुहब्बत हो फिर उस के पाँव को भाते नहीं हैं घुँघरू भी वो जिस के पाँव को ज़ंजीर से मुहब्बत हो किसी कमान की नज़रें हो मेरे सीने पर मिरे भी दिल को किसी तीर से मुहब्बत हो वो रक़्स करते हुए मक़्तलों को बढते हैं कि जिन को यार की शमशीर से मुहब्बत हो ख़ुदा करे के तुझे ऐब शा'इरी का लगे तुझे भी "मीर तक़ी मीर" से मुहब्बत हो वो आँख सोने की दीवार देखती ही नहीं कि जिस को आप की तस्वीर से मुहब्बत हो
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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ये शोख़ियाँ ये जवानी कहाँ से लाएँ हम तुम्हारे हुस्न का सानी कहाँ से लाएँ हम मोहब्बतें वो पुरानी कहाँ से लाएँ हम रुकी नदी में रवानी कहाँ से लाएँ हम हमारी आँख है पैवस्त एक सहरा में अब ऐसी आँख में पानी कहाँ से लाएँ हम हर एक लफ़्ज़ के मा'नी तलाशते हो तुम हर एक लफ़्ज़ का मा'नी कहाँ से लाएँ हम चलो बता दें ज़माने को अपने बारे में कि रोज़ झूटी कहानी कहाँ से लाएँ हम
Varun Anand
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कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए
Varun Anand
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वफ़ा, ख़ुलूस, मदद, देखभाल भूल गए अब ऐसे लफ़्ज़ों का सब इस्तिमाल भूल गए मनाना रूठना हिज्र-ओ-विसाल भूल गए सभी मोहब्बतों का इस्तिमाल भूल गए नज़र के सामने वो बा-कमाल क्या आया हम अपने हिस्से के सारे कमाल भूल गए क़फ़स में लग गया जी आख़िरश परिंदों का जहाँ से आए थे वो डाल-वाल भूल गए फ़ुतूर फिर से चढ़ा है नई मुहब्बत का जनाब पिछली मुहब्बत का हाल भूल गए? फिर उस ने सोच समझ कर इक ऐसी चाल चली कि जिस को देख के सब अपनी चाल भूल गए दिए जलाने थे पर दिल जला दिए हम ने हम अपने फ़न का सही इस्तिमाल भूल गए
Varun Anand
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तिरे चेहरे की रौनक़ खा रहा है ये किस का ग़म तुझे तड़पा रहा है। हमारा सब्र तो पूरा रहा था हमारा फल मगर फीका रहा है मैं उस का सातवाँ हूँ इश्क़ तो क्या वो मेरा कौन सा पहला रहा है। तिरा दुख है तो क्या हैं रोज़ के दुख नए पौदों को बरगद खा रहा है। बिछड़ने में मज़ा भी था सज़ा भी मैं अब ख़ुश हूँ तो वो पछता रहा है हमारे दरमियाँ उलफ़त नहीं है हमारे बीच समझौता रहा है अजाइब घर में रक्खी जाएँगी सब वो जिस-जिस चीज़ को छूता रहा है खड़ी है शाम फिर बाहें पसारे कोई भूला सहर का आ रहा है
Varun Anand
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काश कि मैं भी होता पत्थर गर था उन को प्यारा पत्थर लोगों की तो बात करें क्या तेरा दिल भी निकला पत्थर हम दोनों में बनती कैसे एक था शीशा दूजा पत्थर शीशा तो कमज़ोर बड़ा था फिर भी कैसे टूटा पत्थर सब के हिस्से हीरे मोती मेरे हिस्से आया पत्थर पारस था वो तुम ने जाना सब ने जिस को समझा पत्थर कल तक फूल थे जिन हाथों में उन हाथों में आज था पत्थर
Varun Anand
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