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भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ जब भी आया सामने वो बे-वफ़ा अच्छा लगा

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है

Amjad Islam Amjad

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न आसमाँ से न दुश्मन के ज़ोर ओ ज़र से हुआ ये मोजज़ा तो मिरे दस्त-ए-बे-हुनर से हुआ क़दम उठा है तो पाँव तले ज़मीं ही नहीं सफ़र का रंज हमें ख़्वाहिश-ए-सफ़र से हुआ मैं भीग भीग गया आरज़ू की बारिश में वो अक्स अक्स में तक़्सीम चश्म-ए-तर से हुआ सियाही शब की न चेहरों पे आ गई हो कहीं सहर का ख़ौफ़ हमें आईनों के डर से हुआ कोई चले तो ज़मीं साथ साथ चलती है ये राज़ हम पे अयाँ गर्द-ए-रहगुज़र से हुआ तिरे बदन की महक ही न थी तो क्या रुकते गुज़र हमारा कई बार यूँँ तो घर से हुआ कहाँ पे सोए थे 'अमजद' कहाँ खुलीं आँखें गुमाँ क़फ़स का हमें अपने बाम-ओ-दर से हुआ

Amjad Islam Amjad

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औरों का था बयान तो मौज सदा रहे ख़ुद उम्र भर असीर-ए-लब-ए-मुद्दआ' रहे मिस्ल-ए-हबाब बहर-ए-ग़म-ए-हादसात में हम ज़ेर-ए-बार-ए-मिन्नत-ए-आब-ओ-हवा रहे हम उस से अपनी बात का माँगे अगर जवाब लहरों का पेच-ओ-ख़म वो खड़ा देखता रहे आया तो अपनी आँख भी अपनी न बन सकी हम सोचते थे उस से कभी सामना रहे गुलशन में थे तो रौनक़-ए-रंग-ए-चमन बने जंगल में हम अमानत-ए-बाद-ए-सबा रहे सुर्ख़ी बने तो ख़ून-ए-शहीदाँ का रंग थे रौशन हुए तो मशअ'ल-ए-राह-ए-बक़ा रहे 'अमजद' दर-ए-निगार पे दस्तक ही दीजिए इस बे-कराँ सुकूत में कुछ ग़लग़ला रहे

Amjad Islam Amjad

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रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँँ रोका नहीं यूँँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं क्यूँँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं

Amjad Islam Amjad

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कमाल-ए-हुस्न है हुस्न-ए-कमाल से बाहर अज़ल का रंग है जैसे मिसाल से बाहर तो फिर वो कौन है जो मावरा है हर शय से नहीं है कुछ भी यहाँ गर ख़याल से बाहर ये काएनात सरापा जवाब है जिस का वो इक सवाल है फिर भी सवाल से बाहर है याद अहल-ए-वतन यूँँ कि रेग-ए-साहिल पर गिरी हुई कोई मछली हो जाल से बाहर अजीब सिलसिला-ए-रंग है तमन्ना भी हद-ए-उरूज से आगे ज़वाल है बाहर न उस का अंत है कोई न इस्तिआ'रा है ये दास्तान है हिज्र-ओ-विसाल से बाहर दुआ बुज़ुर्गों की रखती है ज़ख़्म उल्फ़त को किसी इलाज किसी इंदिमाल से बाहर बयाँ हो किस तरह वो कैफ़ियत कि है 'अमजद' मिरी तलब से फ़रावाँ मजाल से बाहर

Amjad Islam Amjad

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