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छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है इक आग सी रहे है क्या जानिए कि क्या है मैं और तू हैं दोनों मजबूर-ए-तौर अपने पेशा तिरा जफ़ा है शेवा मिरा वफ़ा है रू-ए-सुख़न है कीधर अहल-ए-जहाँ का या रब सब मुत्तफ़िक़ हैं इस पर हर एक का ख़ुदा है कुछ बे-सबब नहीं है ख़ातिर मिरी परेशाँ दिल का अलम जुदा है ग़म जान का जुदा है हुस्न उन भी मोइनों का था आप ही सूरतों में इस मर्तबे से आगे कोई चले तो क्या है शादी से ग़म-ए-जहाँ में वो चंद हम ने पाया है ईद एक दिन तो दस रोज़ याँ दहा है है ख़सम-जान-ए-आशिक़ वो महव-ए-नाज़ लेकिन हर लम्हा बे-अदाई ये भी तो इक अदा है हो जाए यास जिस में सो आशिक़ी है वर्ना हर रंज को शिफ़ा है हर दर्द को दवा है नायाब उस गुहर की क्या है तलाश आसाँ जी डूबता है उस का जो तह से आश्ना है मुशफ़िक़ मलाज़ ओ क़िबला का'बा ख़ुदा पयम्बर जिस ख़त में शौक़ से मैं क्या क्या उसे लिखा है तासीर-ए-इश्क़ देखो वो नामा वाँ पहुँच कर जूँ काग़ज़-ए-हवाई हर सू उड़ा फिरा है है गरचे तिफ़्ल-ए-मकतब वो शोख़ अभी तो लेकिन जिस से मिला है उस का उस्ताद हो मिला है फिरते हो 'मीर' साहब सब से जुदे जुदे तुम शायद कहीं तुम्हारा दिल इन दिनों लगा है

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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

Tehzeeb Hafi

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तमन्ना फिर मचल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ ये मौसम भी बदल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ मुझे ग़म है कि मैं ने ज़िंदगी में कुछ नहीं पाया ये ग़म दिल से निकल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ ये दुनिया-भर के झगड़े घर के क़िस्से काम की बातें बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ नहीं मिलते हो मुझ से तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे ज़माना मुझ से जल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

Javed Akhtar

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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की

Meer Taqi Meer

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महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला

Meer Taqi Meer

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शिकवा करूँँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद ख़ूँ हो गया जिगर में अब दाग़ गुल्सिताँ का ले झाड़ू टोकरा ही आता है सुब्ह होते जारूब-कश मगर है ख़ुर्शीद उस के हाँ का दी आग रंग-ए-गुल ने वाँ ऐ सबा चमन को याँ हम जले क़फ़स में सुन हाल आशियाँ का हर सुब्ह मेरे सर पर इक हादिसा नया है पैवंद हो ज़मीं का शेवा इस आसमाँ का इन सैद-अफ़गनों का क्या हो शिकार कोई होता नहीं है आख़िर काम उन के इम्तिहाँ का तब तो मुझे किया था तीरों से सैद अपना अब करते हैं निशाना हर मेरे उस्तुख़्वाँ का फ़ितराक जिस का अक्सर लोहू में तर रहे है वो क़स्द कब करे है इस सैद-ए-नातवाँ का कम-फ़ुर्सती जहाँ के मज में' की कुछ न पूछो अहवाल क्या कहूँ मैं इस मजलिस-ए-रवाँ का सज्दा करें हैं सुन कर औबाश सारे उस को सय्यद पिसर वो प्यारा हैगा इमाम बाँका ना-हक़ शनासी है ये ज़ाहिद न कर बराबर ताअ'त से सौ बरस की सज्दा उस आस्ताँ का हैं दश्त अब ये जीते बस्ते थे शहर सारे वीरान-ए-कुहन है मामूरा इस जहाँ का जिस दिन कि उस के मुँह से बुर्क़ा उठेगा सुनियो उस रोज़ से जहाँ में ख़ुर्शीद फिर न झाँका ना-हक़ ये ज़ुल्म करना इंसाफ़ कह पियारे है कौन सी जगह का किस शहर का कहाँ का सौदाई हो तो रक्खे बाज़ार-ए-इश्क़ में पा सर मुफ़्त बेचते हैं ये कुछ चलन है वाँ का सौ गाली एक चश्मक इतना सुलूक तो है औबाश ख़ाना जंग उस ख़ुश-चश्म बद-ज़बाँ का या रोए या रुलाया अपनी तो यूँँ ही गुज़री क्या ज़िक्र हम-सफ़ीराँ यारान-ए-शादमाँ का क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालगी की गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ा-ख़्वाँ का पूछो तो 'मीर' से क्या कोई नज़र पड़ा है चेहरा उतर रहा है कुछ आज उस जवाँ का

Meer Taqi Meer

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किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश-अख़तरी की इस माह-रू के आगे क्या ताब मुश्तरी की रखना न था क़दम याँ जूँ बा'द बे-ताम्मुल सैर इस जहाँ की रहरव पर तू ने सरसरी की शुब्हा बहाल सग में इक उम्र सिर्फ़ की है मत पूछ इन ने मुझ से जो आदमी-गरी की पाए गुल उस चमन में छोड़ा गया न हम से सर पर हमारे अब के मन्नत है बे-परी की पेशा तो एक ही था उस का हमारा लेकिन मजनूँ के तालेओं ने शोहरत में यावरी की गिर्ये से दाग़-ए-सीना ताज़ा हुए हैं सारे ये किश्त-ए-ख़ुश्क तू ने ऐ चश्म फिर हरी की ये दौर तो मुआफ़िक़ होता नहीं मगर अब रखिए बिना-ए-ताज़ा इस चर्ख़-ए-चम्बरी की ख़ूबाँ तुम्हारी ख़ूबी ता-चंद नक़्ल करिए हम रंजा-ख़ातिरों की क्या ख़ूब दिलबरी की हम से जो 'मीर' उड़ कर अफ़्लाक-ए-चर्ख़ में हैं उन ख़ाक में मलूँ की काहे को हम सेरी की

Meer Taqi Meer

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कब तलक ये सितम उठाइएगा एक दिन यूँँही जी से जाइएगा शक्ल तस्वीर-ए-बे-ख़ुदी कब तक कसो दिन आप में भी आइएगा सब से मिल चल कि हादसे से फिर कहीं ढूँडा भी तो न पाइएगा न मूए हम असीरी में तो नसीम कोई दिन और बाव खाइएगा कहियेगा उस से क़िस्सा-ए-मजनूँ या'नी पर्दे में ग़म सुनाइएगा उस के पा-बोस की तवक़्क़ो' पर अपने तीं ख़ाक में मिलाइएगा उस के पाँव को जा लगी है हिना ख़ूब से हाथ उसे लगाइएगा शिरकत-शैख़-ओ--ब्रहमन से 'मीर' का'बा-ओ-दैर से भी जाइएगा अपनी डेढ़ ईंट की जद्दी मस्जिद किसी वीराने में बनाइयेगा

Meer Taqi Meer

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