चाहे जाने की भी ख़ुशी नहीं है उस को ख़्वाहिश विसाल की नहीं है इस लिए खेल से निकल गया हूँ ये मिरी जीत की घड़ी नहीं है हिज्र की रात कट नहीं रही दोस्त और ये रात आख़िरी नहीं है तुम तो हर शख़्स से ये कहते हो आप से जान क़ीमती नहीं है इस सेे ऊँचे पहाड़ सर किए हैं जीत मेरे लिए नई नहीं है वो बताता रहा गढ़े का मुझे मैं ने उस शख़्स की सुनी नहीं है
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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धुँधला गया हूँ दूर के मंज़र में जा के मैं पछता रहा हूँ शह्र से क़स्बे में आ के मैं अब उस कली पे सिर्फ़ मिरा हक़ है दोस्तो लौटा हूँ हाथ पेड़ को पहले लगा के मैं शो'ला दिए को ज़िन्दगी देते ही बुझ गया मंज़र से हट गया उसे मंज़र पे ला के मैं साहब यक़ीन कीजिए चोरी की ख़ू नहीं बाग़ आ गया हूँ दोस्त की बातों में आ के मैं उस दर के बंद होने का बदला लिया है दोस्त जो बेचता रहा हूँ दरीचे बना के मैं
Nadir Ariz
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कैसे ईमान नहीं लाएँगे हम तेरे सर की क़सम खाएंगे फूल फेकेंगे बस आने पे मेरे अपने बाज़ू नहीं फैलाएँगे इतने बरसो की जुदाई है कि अब उस को देखेंगे तो मर जाएँगे
Nadir Ariz
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मैं उसे चाहने वालों में घिरा छोड़ गया या'नी उस पेड़ को उतना ही घना छोड़ गया चीज़ें गिरती गईं रस्ते में फटे थैले से चोर ग़फ़लत में ठिकाने का पता छोड़ गया वापस आने को तसल्ली दी, न सीने से लगा कोई जाते हुए दरवाज़ा खुला छोड़ गया सिर्फ़ आते हुए क़दमों के निशाँ मिलते हैं ख़ुद कहाँ है जो किनारे पे घड़ा छोड़ गया साथ रक्खा न पलटने दिया घर की जानिब कोई कश्ती को जज़ीरे से लगा छोड़ गया
Nadir Ariz
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पेड़ पौधे हैं तितलियाँ नहीं हैं कैसा क़स्बा है लड़कियाँ नहीं हैं देख कर पाँव रखना पड़ता है इन पहाड़ों पे सीढ़ियाँ नहीं हैं मेरे अँगूठे से खुलेगा ये लॉक इस तिजोरी की चाबियाँ नहीं हैं नाव का वरना मसअला नहीं था इस जज़ीरे पे लकड़ियाँ नहीं हैं बद्दुआ लग गई है किस की उसे उस कलाई में चूड़ियाँ नहीं हैं बारिश आई तो भीग जाएँगे पेड़ों के पास छतरियाँ नहीं हैं
Nadir Ariz
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बोले तो अच्छा बुरा महसूस हो उस की ख़ामोशी से क्या महसूस हो इस तरह दीवार पर तस्वीर रख आदमी बैठा हुआ महसूस हो दाम मुँह माँगे मिलेंगे और नक़्द क़त्ल लेकिन हादसा महसूस हो रख लिया अख़बार पैसों की जगह ताकि बटुआ कुछ भरा महसूस हो देखना चाहूँ उसे तो हर कोई मेरी जानिब' देखता महसूस हो पास जाने पर खुले प्यासे पे रेत दूर से पानी खड़ा महसूस हो
Nadir Ariz
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