दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही मेरी हर शाम तिरी याद की हमराज़ रही शहर में जब भी चले ठंडी हवा के झोंके तपते सहरा की तबीअ'त बड़ी ना-साज़ रही आइने टूट गए अक्स की सच्चाई पर और सच्चाई हमेशा की तरह राज़ रही इक नए मोड़ पे उस ने भी मुझे छोड़ दिया जिस की आवाज़ में शामिल मिरी आवाज़ रही सुनता रहता हूँ बुज़ुर्गों से मैं अक्सर 'ताहिर' वो समाअ'त ही रही और न वो आवाज़ रही
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे
Umair Najmi
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अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुई तुझ से मिलने की ऐ दरिया मजबूरी भी ख़त्म हुई कैसा प्यार कहाँ की उल्फ़त इश्क़ की बात तो जाने दो मेरे लिए अब उस के दिल से हमदर्दी भी ख़त्म हुई सामने वाली बिल्डिंग में अब काम है बस आराइश का कल तक जो मिलती थी हमें वो मज़दूरी भी ख़त्म हुई जेल से वापस आ कर उस ने पांचों वक़्त नमाज़ पढ़ी मुँह भी बंद हुए सब के और बदनामी भी ख़त्म हुई जिस की जल-धारा से बस्ती वाले जीवन पाते थे रस्ता बदलते ही नद्दी के वो बस्ती भी ख़त्म हुई
Tahir Faraz
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जब मिरे होंटों पे मेरी तिश्नगी रह जाएगी तेरी आँखों में भी थोड़ी सी नमी रह जाएगी सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी ख़त्म हो जाएगा जिस दिन भी तुम्हारा इंतिज़ार घर के दरवाज़े पे दस्तक चीख़ती रह जाएगी क्या ख़बर थी आएगा इक रोज़ ऐसा वक़्त भी मेरी गोयाई तिरा मुँह देखती रह जाएगी वक़्त-ए-रुख़्सत आएगा और ख़त्म होगा ये सफ़र मेरे दिल की बात मेरे दिल में ही रह जाएगी
Tahir Faraz
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कोई हसीं मंज़र आँखों से जब ओझल हो जाएगा मुझ को पागल कहने वाला ख़ुद ही पागल हो जाएगा पलकों पे उस की जले बुझेंगे जुगनू जब मिरी यादों के कमरे में होंगी बरसातें घर जंगल हो जाएगा जिस दिन उस की ज़ुल्फ़ें उस के शानों पर खुल जाएँगी उस दिन शर्म से पानी पानी ख़ुद बादल हो जाएगा जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा उस की यादें उस की बातें उस की वफ़ाएँ उस का प्यार किस को ख़बर थी जीना मुश्किल एक इक पल हो जाएगा मत घबरा ऐ प्यासे दरिया सूरज आने वाला है बर्फ़ पहाड़ों से पिघली तो जल ही जल हो जाएगा
Tahir Faraz
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में न कहता था कि शहरों में न जा यार मिरे सोंधी मिट्टी ही में होती है वफ़ा यार मिरे कोई टूटे हुए ख़्वाबों से कहाँ मिलता है हर जगह दर्द का बिस्तर न लगा यार मिरे सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे अपनी चाहत के शब-ओ-रोज़ मुकम्मल कर ले जा ये सूरज भी तिरे नाम किया यार मिरे तुझ से मिलता हूँ तो रिश्ता कोई याद आता है सिलसिला मुझ से ज़ियादा न बढ़ा यार मिरे ऐसा लगता है कि कुछ टूट रहा है मुझ में छोड़ के तू मुझे इस वक़्त न जा यार मिरे ख़ुश-नसीबी से ये साअ'त तिरे हाथ आई है आसमाँ झुकने लगा हाथ बढ़ा यार मिरे
Tahir Faraz
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ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया जुगनू जले बुझे मिरी पलकों पे सुब्ह तक जब भी तिरा ख़याल सर-ए-शाम आ गया महसूस कर रहा हूँ मैं ख़ुशबू की बाज़गश्त शायद तिरे लबों पे मिरा नाम आ गया कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल है क्या बे-साख़्ता लबों पे तिरा नाम आ गया मैं ने तो एक लाश की दी थी ख़बर 'फ़राज़' उल्टा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया
Tahir Faraz
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