ghazalKuch Alfaaz

दिल अभी तक जवान है प्यारे किस मुसीबत में जान है प्यारे तू मिरे हाल का ख़याल न कर इस में भी एक शान है प्यारे तल्ख़ कर दी है ज़िंदगी जिस ने कितनी मीठी ज़बान है प्यारे वक़्त कम है न छेड़ हिज्र की बात ये बड़ी दास्तान है प्यारे जाने क्या कह दिया था रोज़-ए-अज़ल आज तक इम्तिहान है प्यारे हम हैं बंदे मगर तिरे बंदे ये हमारी भी शान है प्यारे नाम है इस का नासेह-ए-मुश्फ़िक़ ये मिरा मेहरबान है प्यारे कब किया मैं ने इश्क़ का दावा तेरा अपना गुमान है प्यारे मैं तुझे बे-वफ़ा नहीं कहता दुश्मनों का बयान है प्यारे सारी दुनिया को है ग़लत-फ़हमी मुझ पे तो मेहरबान है प्यारे तेरे कूचे में है सुकूँ वर्ना हर ज़मीं आसमान है प्यारे ख़ैर फ़रियाद बे-असर ही सही ज़िंदगी का निशान है प्यारे शर्म है एहतिराज़ है क्या है पर्दा सा दरमियान है प्यारे अर्ज़-ए-मतलब समझ के हो न ख़फ़ा ये तो इक दास्तान है प्यारे जंग छिड़ जाए हम अगर कह दें ये हमारी ज़बान है प्यारे

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल कौन तिरी तरह 'हफ़ीज़' दर्द के गीत गा सके

Hafeez Jalandhari

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आख़िर एक दिन शाद करोगे मेरा घर आबाद करोगे प्यार की बातें वस्ल की रातें याद करोगे याद करोगे किस दिल से आबाद किया था किस दिल से बर्बाद करोगे मैं ने अपनी क़ीमत कह दी तुम भी कुछ इरशाद करोगे ज़र के बंदो अक़्ल के अंधो तुम क्या मुझ को शाद करोगे जब मुझ को चुप लग जाएगी फिर तुम भी फ़रियाद करोगे और तुम्हें आता ही क्या है कोई सितम ईजाद करोगे तंग आ कर ऐ बंदा-परवर बंदे को आज़ाद करोगे मेरे दिल में बसने वालो तुम मुझ को बर्बाद करोगे हुस्न को रुस्वा कर के मरूँगा आख़िर तुम क्या याद करोगे हश्र के दिन उम्मीद है नासेह तुम मेरी इमदाद करोगे

Hafeez Jalandhari

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ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है बात होती है मगर बात नहीं होती है बारयाबी का बुरा हो कि अब उन के दर पर अगले वक़्तों की मुदारात नहीं होती है ग़म तो घनघोर घटाओं की तरह उठते हैं ज़ब्त का दश्त है बरसात नहीं होती है ये मिरा तजरबा है हुस्न कोई चाल चले बाज़ी-ए-इश्क़ कभी मात नहीं होती है वस्ल है नाम हम-आहंगी ओ यक-रंगी का वस्ल में कोई बुरी बात नहीं होती है हिज्र तंहाई है सूरज है सवा नेज़े पर दिन ही रहता है यहाँ रात नहीं होती है ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं आज क्या बात है बरसात नहीं होती है मुझे अल्लाह की क़सम शे'र में तहसीन-ए-बुताँ मैं जो करता हूँ मेरी ज़ात नहीं होती है फ़िक्र-ए-तख़्लीक़-ए-सुख़न मसनद-ए-राहत पे हफ़ीज़ बाइस-ए-कश्फ़-ओ-करामात नहीं होती है

Hafeez Jalandhari

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मजाज़ ऐन-ए-हक़ीक़त है बा-सफ़ा के लिए बुतों को देख रहा हूँ मगर ख़ुदा के लिए असर में हो गए क्यूँँ सात आसमाँ हाएल अभी तो हाथ उठे ही नहीं दुआ के लिए हुआ बस एक ही नाले में दम फ़ना अपना ये ताज़ियाना था उम्र-ए-गुरेज़-पा के लिए इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए हमें तो दावर-ए-महशर को छोड़ते ही बनी ख़ता-ए-इश्क़ न काफ़ी हुई सज़ा के लिए उसी को राह दिखाता हूँ जो मिटाए मुझे मैं हूँ तो नूर मगर चश्म-ए-नक़श-ए-पा के लिए ये जानता हूँ कि है निस्फ़ शब मगर साक़ी ज़रा सी चाहिए इक मर्द-ए-पारसा के लिए इलाही तेरे करम से मिले मय ओ माशूक़ अब इल्तिजा है बरसती हुई घटा के लिए 'हफ़ीज़' आज़िम-ए-काबा हुआ है जाने दो अब उस पे रहम करो ऐ बुतो ख़ुदा के लिए

Hafeez Jalandhari

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ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा अब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा हाँ मेरे मजरूह तबस्सुम ख़ुश्क लबों तक आता जा फूल की हस्त-ओ-बूद यही है खिलता जा मुरझाता जा मेरी चुप रहने की आदत जिस कारन बद-नाम हुई अब वो हिकायत आम हुई है सुनता जा शरमाता जा ये दुख-दर्द की बरखा बंदे देन है तेरे दाता की शुक्र-ए-नेमत भी करता जा दामन भी फैलाता जा जीने का अरमान करूँँ या मरने का सामान करूँँ इश्क़ में क्या होता है नासेह अक़्ल की बात सुझाता जा तुझ को अब्र-आलूद दिनों से काम न चाँदनी रातों से बहलाता है बातों से बहलाता जा बहलाता जा दोनों संग-ए-राह-ए-तलब हैं राह-नुमा भी मंज़िल भी ज़ौक़-ए-तलब हर एक क़दम पर दोनों को ठुकराता जा नग़्में से जब फूल खिलेंगे चुनने वाले चुन लेंगे सुनने वाले सुन लेंगे तू अपनी धुन में गाता जा आख़िर तुझ को भी मौत आई ख़ैर 'हफ़ीज़' ख़ुदा-हाफ़िज़ लेकिन मरते मरते प्यारे वज्ह-ए-मर्ग बताता जा

Hafeez Jalandhari

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