दिल की तरफ़ कुछ आह से दिल का लगाओ है टक आप भी तो आइए याँ ज़ोर बाव है उठता नहीं है हाथ तिरा तेग़-ए-जौर से नाहक़ कुशी कहाँ तईं ये क्या सुभाव है बाग़-ए-नज़र है चश्म के मंज़र का सब जहाँ टक ठहरो याँ तो जानो कि कैसा दिखाओ है तक़रीब हम ने डाली है उस से जूए की अब जो बन पड़े है टक तो हमारा ही दाव है टपका करे है आँख से लोहू ही रोज़-ओ-शब चेहरे पे मेरे चश्म है या कोई घाव है ज़ब्त सरिश्क-ए-ख़ूनीं से जी क्यूँँके शाद हो अब दिल की तरफ़ लोहू का सारा बहाओ है अब सब के रोज़गार की सूरत बिगड़ गई लाखों में एक दो का कहीं कुछ बनाओ है छाती के मेरी सारे नुमूदार हैं ये ज़ख़्म पर्दा रहा है कौन सा अब क्या छुपाओ है आशिक़ कहें जो होगे तो जानोगे क़द्र-ए-'मीर' अब तो किसी के चाहने का तुम को चाव है
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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वैसा कहाँ है हम से जैसा कि आगे था तू औरों से मिल के प्यारे कुछ और हो गया तू चालें तमाम बे-ढब बातें फ़रेब हैं सब हासिल कि ऐ शुक्र लब अब वो नहीं रहा तू जाते नहीं उठाए ये शोर हर सहर के या अब चमन में बुलबुल हम ही रहेंगे या तू आ अब्र एक दो दम आपस में रखें सोहबत कुढ़ने को हूँ मैं आँधी रोने को है बला तू तक़रीब पर भी तो तू पहलू तही करे है दस बार ईद आई कब कब गले मिला तू तेरे दहन से उस को निस्बत हो कुछ तो कहिए गुल गो करे है दा'वा ख़ातिर में कुछ न ला तू दिल क्यूँँके रास्त आवे दावा-ए-आश्नाई दरिया-ए-हुस्न वो मह-ए-कश्ती-ब-कफ़ गदा तू हर फ़र्द यास अभी से दफ़्तर है तुझ गले का है क़हर जब कि होगा हर्फ़ों से आश्ना तू आलम है शौक़-ए-कुश्ता-ए-ख़िल्क़त है तेरी रफ़्ता जानों की आरज़ू तू आँखों का मुद्दआ' तू मुँह करिए जिस तरफ़ को सो ही तिरी तरफ़ है पर कुछ नहीं है पैदा कीधर है ए ख़ुदा तू आती ब-ख़ुद नहीं है बाद-ए-बहार अब तक दो गाम था चमन में टक नाज़ से चला तू कम मेरी और आना कम आँख का मिलाना करने से ये अदाएँ है मुद्दआ' कि जा तू गुफ़्त-ओ-शुनूद अक्सर मेरे तिरे रहे है ज़ालिम मुआ'फ़ रखियो मेरा कहा-सुना तो कह साँझ के मूए को ऐ 'मीर' रोईं कब तक जैसे चराग़-ए-मुफ़्लिस इक-दम में जल बुझा तो
Meer Taqi Meer
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यारो मुझे मुआ'फ़ रखो मैं नशे में हूँ अब दो तो जाम ख़ाली ही दो मैं नशे में हूँ एक एक क़ुर्त दौर में यूँँ ही मुझे भी दो जाम-ए-शराब पुर न करो मैं नशे में हूँ मस्ती से दरहमी है मिरी गुफ़्तुगू के बीच जो चाहो तुम भी मुझ को कहो मैं नशे में हूँ या हाथों हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ मा'ज़ूर हूँ जो पाँव मिरा बे-तरह पड़े तुम सरगिराँ तो मुझ से न हो मैं नशे में हूँ भागी नमाज़-ए-जुमा तो जाती नहीं है कुछ चलता हूँ मैं भी टुक तो रहो मैं नशे में हूँ नाज़ुक-मिज़ाज आप क़यामत हैं 'मीर' जी जूँ शीशा मेरे मुँह न लगो मैं नशे में हूँ
Meer Taqi Meer
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हम भी फिरते हैं यक हशम ले कर दस्ता-ए-दाग़-ओ-फ़ौज-ए-ग़म ले कर दस्त-कश नाला पेश-रौ गिर्या आह चलती है याँ इल्म ले कर मर्ग इक माँदगी का वक़्फ़ा है या'नी आगे चलेंगे दम ले कर उस के ऊपर कि दिल से था नज़दीक ग़म-ए-दूरी चले हैं हम ले कर तेरी वज़-ए-सितम से ऐ बे-दर्द एक आलम गया अलम ले कर बारहा सैद-गह से उस की गए दाग़-ए-यास आहु-ए-हरम ले कर ज़ोफ़ याँ तक खिंचा कि सूरत-गर रह गए हाथ में क़लम ले कर दिल पे कब इक्तिफ़ा करे है इश्क़ जाएगा जान भी ये ग़म ले कर शौक़ अगर है यही तो ऐ क़ासिद हम भी आते हैं अब रक़म ले कर 'मीर'-साहिब ही चूके ए बद-अहद वर्ना देना था दिल क़सम ले कर
Meer Taqi Meer
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यूँँ ही हैरान-ओ-ख़फ़ा जों ग़ुंचा-ए-तस्वीर हों उम्र गुज़री पर न जाना मैं कि क्यूँँ दिल-गीर हों इतनी बातें मत बना मुझ शेफ़ते से नासेहा पंद के लाएक़ नहीं मैं क़ाबिल-ए-ज़ंजीर हों सुर्ख़ रहती हैं मिरी आँखें लहू रोने से शैख़ मय अगर साबित हो मुझ पर वाजिब अल-ताज़ीर हूँ ने फ़लक पर राह मुझ को ने ज़मीं पर रौ मुझे ऐसे किस महरूम का में शोर-ए-बे-तासीर हूँ जों कमाँ गरचे ख़मीदा हूँ पे छूटा और वहीं उस के कूचे की तरफ़ चलने को यारो तीर हूँ जो मिरे हिस्से में आवे तेग़-ए-जमधर सैल-ओ-कार्द ये फ़ुज़ूली है कि मैं ही कुश्ता-ए-शमशीर हूँ खोल कर दीवान मेरा देख क़ुदरत मुद्दई' गरचे हूँ मैं नौजवाँ पर शाइ'रों का पीर हूँ यूँँ सआ'दत एक जमधर मुझ को भी गुज़ारिए मुंसिफ़ी कीजे तो मैं तो महज़ बे-तक़सीर हूँ इस क़दर बे-नंग ख़बतों को नसीहत शैख़-जी बाज़ आओ वर्ना अपने नाम को मैं 'मीर' हूँ
Meer Taqi Meer
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मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिला जा मिस्र में हुआ था पाकीज़ा गौहरों की इज़्ज़त नहीं वतन में दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की तब दर्द है हमारे ऐ 'मीर' हर सुख़न में
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