दिन नहीं रात नहीं सुब्ह नहीं शाम नहीं वक़्त मिलने का मगर दाख़िल-ए-अय्याम नहीं मिस्ल अन्क़ा मुझे तुम दूर से सुन लो वर्ना नंग-ए-हस्ती हूँ मिरी जाए ब-जुज़ नाम नहीं ख़तर राह-ए-वफ़ा बल्कि बहुत दूर खिंचा उम्र गुज़री कि बहम नामा-ओ-पैग़ाम नहीं राज़-पोशी-ए-मोहब्बत के तईं चाहिए ज़ब्त सो तो बे-ताबी-ए-दिल बिन मुझे आराम नहीं बे-क़रारी जो कोई देखे है सो कहता है कुछ तो है 'मीर' कि इक दम तुझे आराम नहीं
Related Ghazal
किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
95 likes
कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
70 likes
महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं
Tehzeeb Hafi
116 likes
नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा
Tehzeeb Hafi
83 likes
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम
Jaun Elia
67 likes
More from Meer Taqi Meer
ख़राबी कुछ न पूछो मुलकत-ए-दिल की इमारत की ग़मों ने आज-कल सुनियो वो आबादी ही ग़ारत की निगाह-ए-मस्त से जब चश्म ने इस की इशारत की हलावत मय की और बुनियाद मयख़ाने की ग़ारत की सहर-गह मैं ने पूछा गुल से हाल-ए-ज़ार बुलबुल का पड़े थे बाग़ में यक-मुशत पर ऊधर इशारत की जलाया जिस तजल्ली-ए-जल्वा-गर ने तूर को हम-दम उसी आतिश के पर काले ने हम से भी शरारत की नज़ाकत क्या कहूँ ख़ुर्शीद-रू की कल शब-ए-मह में गया था साए साए बाग़ तक तिस पर हरारत की नज़र से जिस की यूसुफ़ सा गया फिर उस को क्या सूझे हक़ीक़त कुछ न पूछो पीर-ए-कनआँ' की बसारत की तिरे कूचे के शौक़-ए-तौफ़ में जैसे बगूला था बयाबाँ मैं ग़ुबार 'मीर' की हम ने ज़ियारत की
Meer Taqi Meer
0 likes
महर की तुझ से तवक़्क़ो' थी सितमगर निकला मोम समझे थे तिरे दिल को सो पत्थर निकला दाग़ हूँ रश्क-ए-मोहब्बत से कि इतना बेताब किस की तस्कीं के लिए घर से तू बाहर निकला जीते जी आह तिरे कूचे से कोई न फिरा जो सितम-दीदा रहा जा के सो मर कर निकला दिल की आबादी की इस हद है ख़राबी कि न पूछ जाना जाता है कि उस राह से लश्कर निकला अश्क-ए-तर क़तरा-ए-ख़ूँ लख़्त-ए-जिगर पारा-ए-दिल एक से एक अदद आँख से बह कर निकला कुंज-कावी जो की सीने की ग़म-ए-हिज्राँ ने इस दफ़ीने में से अक़साम-ए-जवाहर निकला हम ने जाना था लिखेगा तू कोई हर्फ़ ऐ 'मीर' पर तिरा नामा तो इक शौक़ का दफ़्तर निकला
Meer Taqi Meer
0 likes
किस हुस्न से कहूँ मैं उस की ख़ुश-अख़तरी की इस माह-रू के आगे क्या ताब मुश्तरी की रखना न था क़दम याँ जूँ बा'द बे-ताम्मुल सैर इस जहाँ की रहरव पर तू ने सरसरी की शुब्हा बहाल सग में इक उम्र सिर्फ़ की है मत पूछ इन ने मुझ से जो आदमी-गरी की पाए गुल उस चमन में छोड़ा गया न हम से सर पर हमारे अब के मन्नत है बे-परी की पेशा तो एक ही था उस का हमारा लेकिन मजनूँ के तालेओं ने शोहरत में यावरी की गिर्ये से दाग़-ए-सीना ताज़ा हुए हैं सारे ये किश्त-ए-ख़ुश्क तू ने ऐ चश्म फिर हरी की ये दौर तो मुआफ़िक़ होता नहीं मगर अब रखिए बिना-ए-ताज़ा इस चर्ख़-ए-चम्बरी की ख़ूबाँ तुम्हारी ख़ूबी ता-चंद नक़्ल करिए हम रंजा-ख़ातिरों की क्या ख़ूब दिलबरी की हम से जो 'मीर' उड़ कर अफ़्लाक-ए-चर्ख़ में हैं उन ख़ाक में मलूँ की काहे को हम सेरी की
Meer Taqi Meer
0 likes
क्या कहें अपनी उस की शब की बात कहिए होवे जो कुछ भी ढब की बात अब तो चुप लग गई है हैरत से फिर खुलेगी ज़बान जब की बात नुक्ता-दानान-ए-रफ़्ता की न कहो बात वो है जो होवे अब की बात किस का रू-ए-सुख़न नहीं है उधर है नज़र में हमारी सब की बात ज़ुल्म है क़हर है क़यामत है ग़ुस्से में उस के ज़ेर-ए-लब की बात कहते हैं आगे था बुतों में रहम है ख़ुदा जानिए ये कब की बात गो कि आतिश-ज़बाँ थे आगे 'मीर' अब की कहिए गई वो तब की बात
Meer Taqi Meer
1 likes
बंद-ए-क़बा को ख़ूबाँ जिस वक़्त वा करेंगे ख़म्याज़ा-कश जो होंगे मिलने के क्या करेंगे रोना यही है मुझ को तेरी जफ़ा से हर-दम ये दिल-दिमाग़ दोनों कब तक वफ़ा करेंगे है दीन सर का देना गर्दन पे अपनी ख़ूबाँ जीते हैं तो तुम्हारा ये क़र्ज़ अदा करेंगे दरवेश हैं हम आख़िर दो-इक निगह की रुख़्सत गोशे में बैठे प्यारे तुम को दुआ करेंगे आख़िर तो रोज़े आए दो-चार रोज़ हम भी तरसा बचों में जा कर दारू पिया करेंगे कुछ तो कहेगा हम को ख़ामोश देख कर वो इस बात के लिए अब चुप ही रहा करेंगे आलम मिरे है तुझ पर आई अगर क़यामत तेरी गली के हर-सू महशर हुआ करेंगे दामान-ए-दश्त सूखा अब्रों की बे-तही से जंगल में रोने को अब हम भी चला करेंगे लाई तिरी गली तक आवारगी हमारी ज़िल्लत की अपनी अब हम इज़्ज़त किया करेंगे अहवाल-'मीर' क्यूँँकर आख़िर हो एक शब में इक उम्र हम ये क़िस्सा तुम से कहा करेंगे
Meer Taqi Meer
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Meer Taqi Meer.
Similar Moods
More moods that pair well with Meer Taqi Meer's ghazal.







