इक हिजरत की आवाज़ों का कोई बैन सुने दरवाज़ों का ज़करिय्या पेड़ों की मत सुन ये जंगल है ख़मयाज़ों का तिरे सर में सोज़ नहीं प्यारे तू अहल नहीं मिरे साज़ों का औरों को सलाहें देता है कोई डसा हुआ अंदाज़ों का मिरा नख़रा करना बनता है मैं ग़ाज़ी हूँ तिरे गाज़ों का इक रेढ़ी वाला मुंकिर है तिरी तोपों और जहाज़ों का
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
Nida Fazli
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अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं
Varun Anand
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है
Abbas Qamar
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हालत ए हिज्र में हूँ यार मेरी सम्त न देख तू न हो जाए गिरफ्तार, मेरी सम्त न देख आस्तीन में जो छूपे सांप हैं उन को तो निकाल अपने नुक़सान पर हर बार मेरी सम्त न देख तुझ को जिस बात का 'ख़द्शा' है वो हो सकती है ऐसे नश्शे में लगातार मेरी सम्त न देख या कोई बात सुना या मुझे सीने से लगा इस तरह बैठ कर बेकार मेरी सम्त न देख तेरा यारों से नहीं जेब से याराना है ऐ मोहब्बत के दुकाँदार मेरी सम्त न देख
Ali Zaryoun
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चरागाहें नई आबाद होगी मगर जो बस्तियाँ बर्बाद होगी ख़ुदा मिट्टी को फिर से हुक्म देगा कई शक्लें नई ईजाद होगी अभी मुमकिन नहीं लेकिन ये होगा किताबें साहिब-ए-औलाद होगी मैं उन आँखों को पढ़ कर सोचता हूँ ये नज्में किस तरह से याद होगी ये परियाँ फिर नहीं आएगी मिलने ये ग़ज़लें फिर नहीं इरशाद होगी मैं डरता हूँ अली उन आदतों से के जो मुझ को तुम्हारे बा'द होगी
Ali Zaryoun
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अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं ख़ुद अपने साथ हूँ या'नी ख़ुदा के साथ हूँ मैं मुजावरान-ए-हवस तंग हैं कि यूँँ कैसे बग़ैर शर्म-ओ-हया भी हया के साथ हूँ मैं सफ़र शुरूअ' तो होने दे अपने साथ मिरा तू ख़ुद कहेगा ये कैसी बला के साथ हूँ मैं मैं छू गया तो तिरा रंग काट डालूँगा सो अपने आप से तुझ को बचा के साथ हूँ मैं दुरूद-बर-दिल-ए-वहशी सलाम-बर-तप-ए-इश्क़ ख़ुद अपनी हम्द ख़ुद अपनी सना के साथ हूँ मैं यही तो फ़र्क़ है मेरे और उन के हल के बीच शिकायतें हैं उन्हें और रज़ा के साथ हूँ मैं मैं अव्वलीन की इज़्ज़त में आख़िरीन का नूर वो इंतिहा हूँ कि हर इब्तिदा के साथ हूँ मैं दिखाई दूँ भी तो कैसे सुनाई दूँ भी तो क्यूँँ वरा-ए-नक़्श-ओ-नवा हूँ फ़ना के साथ हूँ मैं ब-हुक्म-ए-यार लवें कब्ज़ करने आती है बुझा रही है? बुझाए हवा के साथ हूँ मैं ये साबिरीन-ए-मोहब्बत ये काशिफ़ीन-ए-जुनूँ इन्ही के संग इन्हीं औलिया के साथ हूँ मैं किसी के साथ नहीं हूँ मगर जमाल-ए-इलाहा तिरी क़िस्म तिरे हर मुब्तला के साथ हूँ मैं ज़माने भर को पता है मैं किस तरीक़ पे हूँ सभी को इल्म है किस दिल-रुबा के साथ हूँ मैं मुनाफ़िक़ीन-ए-तसव्वुफ़ की मौत हूँ मैं 'अली' हर इक असील हर इक बे-रिया के साथ हूँ मैं
Ali Zaryoun
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वो ही कर्तबा तेरी याद का, वो ही नै नवा ए ख़याल है वो ही मैं जो था तेरे हिज्र में, वो ही मशहद ए ख़द-ओ-ख़ाल है तेरी नींद किस के लिए उड़ी, मेरा ख़्वाब किस ने बुझा दिया इसे सुन कर रूख़ नहीं फेरना, तेरे मातमी का सवाल है ये मजाक़ तो नहीं हो रहा, मैं ख़ुशी से तो नहीं रो रहा कोई फिल्म तो नहीं चल रही, मेरी जान ये मेरा हाल है किसी सैय्यदा के चरण पडूं, कोई काज़मी जो दुआ करे कोई हो जो ग़म की हया करे, मेरा कर्बलाई मलाल है वो चराग़ ए शहर ए विफाक़ है, मेरे साथ जिस का फिराक़ है भले दूर पार से ही सही, मेरा राब़्ता तो बहाल है वो ख़ुशी से इतनी निहाल थी कि "अली" मैं सोच कर डर गया मैं उसे बता ही नहीं सका कि ये मेरी आख़िरी कॉल है
Ali Zaryoun
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सुकूत-ए-शाम का हिस्सा तू मत बना मुझ को मैं रंग हूँ सो किसी मौज में मिला मुझ को मैं इन दिनों तिरी आँखों के इख़्तियार में हूँ जमाल-ए-सब्ज़ किसी तजरबे में ला मुझ को मैं बूढे जिस्म की ज़िल्लत उठा नहीं सकता किसी क़दीम तजल्ली से कर नया मुझ को मैं अपने होने की तकमील चाहता हूँ सखी सो अब बदन की हिरासत से कर रिहा मुझ को मुझे चराग़ की हैरत भी हो चुकी मालूम अब इस से आगे कोई रास्ता बता मुझ को उस इस्म-ए-ख़ास की तरकीब से बना हूँ मैं मोहब्बतों के तलफ़्फ़ुज़ से कर नया मुझ को दरून-ए-सीना जिसे दिल समझ रहा था 'अली' वो नीली आग है ये अब पता चला मुझ को
Ali Zaryoun
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