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ग़ैरों को अब गले लगाओ, जाओ तुम को छोड़ दिया सब को मेरे ऐब गिनाओ, जाओ तुम को छोड़ दिया कैसा हूँ? किस हाल में हूँ? क्यूँ पूछ रही हो अब मुझ सेे? फिर से माथा मत ठनकाओ, जाओ तुम को छोड़ दिया किस सेे मिलने की ख़्वाहिश आँखों में भर कर आई हो? जाओ-जाओ, जल्दी जाओ, जाओ तुम को छोड़ दिया चाहा था कि नाम तुम्हारा साथ हमारे आएगा अब चाहे जिस की कहलाओ, जाओ तुम को छोड़ दिया हम ही कितने पागल थे जो तुम पर ग़ज़लें कहते थे अब मत कहना शे'र सुनाओ, जाओ तुम को छोड़ दिया

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम

Jaun Elia

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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तुम ने कहा ख़राब चलो हम ख़राब हैं दें और क्या जवाब चलो हम ख़राब हैं कैसी वफ़ा कहाँ की वफ़ा कौन सी वफ़ा सब छोड़ दो हिसाब चलो हम ख़राब हैं हम ने शरीफ़ होने की क़ीमत चुकाई है लाओ ज़रा शराब चलो हम ख़राब हैं जिस ख़ूबसूरती से ज़फा कर रहे हो तुम वो फ़न है लाजवाब चलो हम ख़राब हैं

Kumar Vikas

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हिज्र कहाँ तक सह पाओगी इश्क़ करो तन्हाई में मर जाओगी इश्क़ करो एक ही दिल है दिल की चाहत मत मारो आख़िर इक दिन पछताओगी इश्क़ करो तकिया टेडी बीयर और खिलौनों से कब तक ख़ुद को बहलाओगी इश्क़ करो कितने दिन तक कितने सारे लड़कों को दोस्त बना कर टहलाओगी इश्क़ करो

Kumar Vikas

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अलग धारे में बहते हैं, यहीं तक साथ था अपना चलो कश्ती बदलते हैं, यहीं तक साथ था अपना यही तक़दीर का लिक्खा, यही है वक़्त की मर्ज़ी यही हालात कहते हैं, यहीं तक साथ था अपना जुदा होने पे अश्कों की रवायत तोड़ दी जाए चलो हँसकर बिछड़ते हैं, यहीं तक साथ था अपना तुम्हारी इक नई दुनिया तुम्हें आवाज़ देती है सुनो अब हम निकलते हैं, यहीं तक साथ था अपना सफ़र भी दूर का है शाम भी ढलने को आई है इजाज़त दो कि चलते हैं, यहीं तक साथ था अपना

Kumar Vikas

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