गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर होश ओ ख़िरद शिकार कर क़ल्ब ओ नज़र शिकार कर इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब में या तो ख़ुद आश्कार हो या मुझे आश्कार कर तू है मुहीत-ए-बे-कराँ मैं हूँ ज़रा सी आबजू या मुझे हम-कनार कर या मुझे बे-कनार कर मैं हूँ सदफ़ तो तेरे हाथ मेरे गुहर की आबरू मैं हूँ ख़ज़फ़ तो तू मुझे गौहर-ए-शाहवार कर नग़्मा-ए-नौ-बहार अगर मेरे नसीब में न हो उस दम-ए-नीम-सोज़ को ताइरक-ए-बहार कर बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँँ कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर रोज़-ए-हिसाब जब मिरा पेश हो दफ़्तर-ए-अमल आप भी शर्मसार हो मुझ को भी शर्मसार कर
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ख़िरद की इता'अत ज़रूरी सही यही तो जुनूँ का ज़माना भी है न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़' ज़माने को आगे बढ़ाना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है
Asrar Ul Haq Majaz
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चमन में कौन बबूलों की डाल खींचता है यहाँ जो आता है फूलों के गाल खींचता है वो तीर बा'द में पहले सवाल खींचता है सवाल भी जो समाअ'त की खाल खींचता है ऐ प्यार बाँटने वाले मैं ख़ूब जानता हूँ कि कितनी देर में मछवारा जाल खींचता है निकल भी सकता हूँ क़ैद-ए-तख़य्युलात से गर वो शख़्स खींच ले जिस का ख़याल खींचता है मैं उस के आगे नहीं खींचता नियाम से तेग़ वो शेर-शाह जो दुश्मन की ढाल खींचता है ये सर्द सुब्ह में सोया शरारती सूरज बस आँख खुलते ही परियों की शाल खींचता है मैं होश-मंद हूँ ख़ुद भी सो मेरी ग़ज़लों में न रक़्स करता है आशिक़ न बाल खींचता है
Charagh Sharma
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बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं मिरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमाँ हैं निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं जिसे कहती है दुनिया कामयाबी वाए नादानी उसे किन क़ीमतों पर कामयाब इंसान लेते हैं निगाह-ए-बादा-गूँ यूँँ तो तिरी बातों का क्या कहना तिरी हर बात लेकिन एहतियातन छान लेते हैं तबीअत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं हयात-ए-इश्क़ का इक इक नफ़स जाम-ए-शहादत है वो जान-ए-नाज़-बरदाराँ कोई आसान लेते हैं हम-आहंगी में भी इक चाशनी है इख़्तिलाफ़ों की मिरी बातें ब-उनवान-ए-दिगर वो मान लेते हैं तिरी मक़बूलियत की वज्ह वाहिद तेरी रमज़िय्यत कि उस को मानते ही कब हैं जिस को जान लेते हैं अब इस को कुफ़्र मानें या बुलंदी-ए-नज़र जानें ख़ुदा-ए-दो-जहाँ को दे के हम इंसान लेते हैं जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का इबारत देख कर जिस तरह मानी जान लेते हैं तुझे घाटा न होने देंगे कारोबार-ए-उल्फ़त में हम अपने सर तिरा ऐ दोस्त हर एहसान लेते हैं हमारी हर नज़र तुझ से नई सौगंध खाती है तो तेरी हर नज़र से हम नया पैमान लेते हैं रफ़ीक़-ए-ज़िंदगी थी अब अनीस-ए-वक़्त-ए-आख़िर है तिरा ऐ मौत हम ये दूसरा एहसान लेते हैं ज़माना वारदात-ए-क़ल्ब सुनने को तरसता है इसी से तो सर आँखों पर मिरा दीवान लेते हैं 'फ़िराक़' अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं
Firaq Gorakhpuri
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बे-दिली क्या यूँँही दिन गुज़र जाएँगे सिर्फ़ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएँगे रक़्स है रंग पर रंग हम-रक़्स हैं सब बिछड़ जाएँगे सब बिखर जाएँगे ये ख़राबातियान-ए-ख़िरद-बाख़्ता सुब्ह होते ही सब काम पर जाएँगे कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे है ग़नीमत कि असरार-ए-हस्ती से हम बे-ख़बर आए हैं बे-ख़बर जाएँगे
Jaun Elia
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आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है भूल जाता हूँ मैं सितम उस के वो कुछ इस सादगी से मिलता है आज क्या बात है कि फूलों का रंग तेरी हँसी से मिलता है सिलसिला फ़ित्ना-ए-क़यामत का तेरी ख़ुश-क़ामती से मिलता है मिल के भी जो कभी नहीं मिलता टूट कर दिल उसी से मिलता है कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं होश जब बे-ख़ुदी से मिलता है रूह को भी मज़ा मोहब्बत का दिल की हम-साएगी से मिलता है
Jigar Moradabadi
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अपनी जौलाँ-गाह ज़ेर-ए-आसमाँ समझा था मैं आब ओ गिल के खेल को अपना जहाँ समझा था मैं बे-हिजाबी से तिरी टूटा निगाहों का तिलिस्म इक रिदा-ए-नील-गूँ को आसमाँ समझा था मैं कारवाँ थक कर फ़ज़ा के पेच-ओ-ख़म में रह गया मेहर ओ माह ओ मुश्तरी को हम-इनाँ समझा था मैं इश्क़ की इक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम इस ज़मीन ओ आसमाँ को बे-कराँ समझा था मैं कह गईं राज़-ए-मोहब्बत पर्दा-दारी-हा-ए-शौक़ थी फ़ुग़ाँ वो भी जिसे ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ समझा था मैं थी किसी दरमाँदा रह-रौ की सदा-ए-दर्दनाक जिस को आवाज़-ए-रहील-ए-कारवाँ समझा था मैं
Allama Iqbal
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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं रगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं जिसे कसाद समझते हैं ताजिरान-ए-फ़रंग वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं बड़ा करीम है 'इक़बाल'-ए-बे-नवा लेकिन अता-ए-शोला शरर के सिवा कुछ और नहीं
Allama Iqbal
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असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद नहीं है दाद का तालिब ये बंदा-ए-आज़ाद ये मुश्त-ए-ख़ाक ये सरसर ये वुसअ'त-ए-अफ़्लाक करम है या कि सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद ठहर सका न हवा-ए-चमन में ख़ेमा-ए-गुल यही है फ़स्ल-ए-बहारी यही है बाद-ए-मुराद क़ुसूर-वार ग़रीब-उद-दयार हूँ लेकिन तिरा ख़राबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद मिरी जफ़ा-तलबी को दुआएँ देता है वो दश्त-ए-सादा वो तेरा जहान-ए-बे-बुनियाद ख़तर-पसंद तबीअत को साज़गार नहीं वो गुल्सिताँ कि जहाँ घात में न हो सय्याद मक़ाम-ए-शौक़ तिरे क़ुदसियों के बस का नहीं उन्हीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़ियाद
Allama Iqbal
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नाला है बुलबुल-ए-शोरीदा तिरा ख़ाम अभी अपने सीने में इसे और ज़रा थाम अभी पुख़्ता होती है अगर मस्लहत-अंदेश हो अक़्ल इश्क़ हो मस्लहत-अंदेश तो है ख़ाम अभी बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़ अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी इश्क़ फ़र्मूदा-ए-क़ासिद से सुबुक-गाम-ए-अमल अक़्ल समझी ही नहीं म'अनी-ए-पैग़ाम अभी शेवा-ए-इश्क़ है आज़ादी ओ दहर-आशेबी तू है ज़ुन्नारी-ए-बुत-ख़ाना-ए-अय्याम अभी उज़्र-ए-परहेज़ पे कहता है बिगड़ कर साक़ी है तिरे दिल में वही काविश-ए-अंजाम अभी सई-ए-पैहम है तराज़ू-कम-ओ-कैफ़-ए-हयात तेरी मीज़ाँ है शुमार-ए-सहर-ओ-शाम अभी अब्र-ए-नैसाँ ये तुनुक-बख़्शी-ए-शबनम कब तक मेरे कोहसार के लाले हैं तही-जाम अभी बादा-गर्दान-ए-अजम वो अरबी मेरी शराब मिरे साग़र से झिजकते हैं मय-आशाम अभी ख़बर 'इक़बाल' की लाई है गुलिस्ताँ से नसीम नौ-गिरफ़्तार फड़कता है तह-ए-दाम अभी
Allama Iqbal
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ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी शे'र मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी
Allama Iqbal
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