ghazalKuch Alfaaz

घर का रस्ता भी मिला था शायद राह में संग-ए-वफ़ा था शायद इस क़दर तेज़ हवा के झोंके शाख़ पर फूल खिला था शायद जिस की बातों के फ़साने लिक्खे उस ने तो कुछ न कहा था शायद लोग बे-मेहर न होते होंगे वहम सा दिल को हुआ था शायद तुझ को भूले तो दुआ तक भूले और वही वक़्त-ए-दुआ था शायद ख़ून-ए-दिल में तो डुबोया था क़लम और फिर कुछ न लिखा था शायद दिल का जो रंग है ये रंग 'अदा' पहले आँखों में रचा था शायद

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना दुआ आसाँ नहीं रहना सुख़न दुश्वार हो जाना तुम्हें देखें निगाहें और तुम को ही नहीं देखें मोहब्बत के सभी रिश्तों का यूँँ नादार हो जाना अभी तो बे-नियाज़ी में तख़ातुब की सी ख़ुशबू थी हमें अच्छा लगा था दर्द का दिलदार हो जाना अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना अभी कुछ अन-कहे अल्फ़ाज़ भी हैं कुंज-ए-मिज़्गाँ में अगर तुम इस तरफ़ आओ सबा-रफ़्तार हो जाना हवा तो हम-सफ़र ठहरी समझ में किस तरह आए हवाओं का हमारी राह में दीवार हो जाना अभी तो सिलसिला अपना ज़मीं से आसमाँ तक था अभी देखा था रातों का सहर-आसार हो जाना हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

Ada Jafarey

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आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है अहवाल जी का ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन सा है कुछ यादगार अपनी मगर छोड़ कर गईं जाती रुतों का हाल दिलों की लगन सा है आँखें बरस गईं तो निखार और आ गया यादों का रंग भी तो गुल-ओ-यासमन सा है किस मोड़ पर हैं आज हम ऐ रहगुज़ार-ए-नाज़ अब दर्द का मिज़ाज किसी हम-सुख़न सा है है अब भी रंग रंग-ए-तमन्ना का पैरहन ख़्वाबों के साथ अब भी वही हुस्न-ए-ज़न सा है किन मंज़िलों लुटे हैं मोहब्बत के क़ाफ़िले इंसाँ ज़मीं पे आज ग़रीब-उल-वतन सा है वो जिस का साथ छोड़ चुका नाज़-ए-आगही अब भी तलाश-ए-रह में वही राहज़न सा है शाख़ों का रंग-रूप ख़िज़ाँ ले गई मगर अंदाज़ आज भी वही अर्बाब-ए-फ़न सा है ख़ुशबू के थामने को बढ़ाए हैं हाथ 'अदा' दामान-ए-आरज़ू भी सबा-पैरहन सा है

Ada Jafarey

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एक आईना रू-ब-रू है अभी उस की ख़ुश्बू से गुफ़्तुगू है अभी वही ख़ाना-ब-दोश उम्मीदें वही बे-सब्र दिल की ख़ू है अभी दिल के गुंजान रास्तों पे कहीं तेरी आवाज़ और तू है अभी ज़िंदगी की तरह ख़िराज-तलब कोई दरमाँदा आरज़ू है अभी बोलते हैं दिलों के सन्नाटे शोर सा ये जो चार-सू है अभी ज़र्द पत्तों को ले गई है हवा शाख़ में शिद्दत-ए-नुमू है अभी वर्ना इंसान मर गया होता कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी हम-सफ़र भी हैं रहगुज़र भी है ये मुसाफ़िर ही कू-ब-कू है अभी

Ada Jafarey

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दीप था या तारा क्या जाने दिल में क्यूँँ डूबा क्या जाने गुल पर क्या कुछ बीत गई है अलबेला झोंका क्या जाने आस की मैली चादर ओढ़े वो भी था मुझ सा क्या जाने रीत भी अपनी रुत भी अपनी दिल रस्म-ए-दुनिया क्या जाने उँगली थाम के चलने वाला नगरी का रस्ता क्या जाने कितने मोड़ अभी बाक़ी हैं तुम जानो साया क्या जाने कौन खिलौना टूट गया है बालक बे-परवा क्या जाने ममता ओट दहकते सूरज आँखों का तारा क्या जाने

Ada Jafarey

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आख़िरी टीस आज़माने को जी तो चाहा था मुस्कुराने को याद इतनी भी सख़्त-जाँ तो नहीं इक घरौंदा रहा है ढाने को संग-रेज़ो में ढल गए आँसू लोग हँसते रहे दिखाने को ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता है इक दिया रह गया जलाने को जलने वाले तो जल बुझे आख़िर कौन देता ख़बर ज़माने को कितने मजबूर हो गए होंगे अन-कही बात मुँह पे लाने को खुल के हँसना तो सब को आता है लोग तरसे हैं इक बहाने को रेज़ा रेज़ा बिखर गया इंसाँ दिल की वीरानियाँ जताने को हसरतों की पनाह-गाहों में क्या ठिकाने हैं सर छुपाने को हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी फूल बालों में इक सजाने को आस की बात हो कि साँस 'अदा' ये खिलौने थे टूट जाने को

Ada Jafarey

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