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अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना दुआ आसाँ नहीं रहना सुख़न दुश्वार हो जाना तुम्हें देखें निगाहें और तुम को ही नहीं देखें मोहब्बत के सभी रिश्तों का यूँँ नादार हो जाना अभी तो बे-नियाज़ी में तख़ातुब की सी ख़ुशबू थी हमें अच्छा लगा था दर्द का दिलदार हो जाना अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना अभी कुछ अन-कहे अल्फ़ाज़ भी हैं कुंज-ए-मिज़्गाँ में अगर तुम इस तरफ़ आओ सबा-रफ़्तार हो जाना हवा तो हम-सफ़र ठहरी समझ में किस तरह आए हवाओं का हमारी राह में दीवार हो जाना अभी तो सिलसिला अपना ज़मीं से आसमाँ तक था अभी देखा था रातों का सहर-आसार हो जाना हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

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तमन्ना फिर मचल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ ये मौसम भी बदल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ मुझे ग़म है कि मैं ने ज़िंदगी में कुछ नहीं पाया ये ग़म दिल से निकल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ ये दुनिया-भर के झगड़े घर के क़िस्से काम की बातें बला हर एक टल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ नहीं मिलते हो मुझ से तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे ज़माना मुझ से जल जाए अगर तुम मिलने आ जाओ

Javed Akhtar

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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

Jaun Elia

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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम

Ahmad Faraz

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इस से पहले कि तुझे और सहारा न मिले मैं तिरे साथ हूँ जब तक मिरे जैसा न मिले कम से कम बदले में जन्नत उसे दे दी जाए जिस मोहब्बत के गिरफ्तार को सेहरा ना मिले लोग कहते है के हम लोग बुरे आदमी है लोग भी ऐसे जिन्होने हमें देखा ना मिले बस यही कह के उसे मैं ने ख़ुदा को सौंपा इत्तिफ़ाक़न कही मिल जाए तो रोता ना मिले बद-दुआ है के वहाँ आए जहाँ बैठते थे और ‘अफ्कार’ वहाँ आप को बैठा ना मिले

Afkar Alvi

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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं

Jawwad Sheikh

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घर का रस्ता भी मिला था शायद राह में संग-ए-वफ़ा था शायद इस क़दर तेज़ हवा के झोंके शाख़ पर फूल खिला था शायद जिस की बातों के फ़साने लिक्खे उस ने तो कुछ न कहा था शायद लोग बे-मेहर न होते होंगे वहम सा दिल को हुआ था शायद तुझ को भूले तो दुआ तक भूले और वही वक़्त-ए-दुआ था शायद ख़ून-ए-दिल में तो डुबोया था क़लम और फिर कुछ न लिखा था शायद दिल का जो रंग है ये रंग 'अदा' पहले आँखों में रचा था शायद

Ada Jafarey

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दीप था या तारा क्या जाने दिल में क्यूँँ डूबा क्या जाने गुल पर क्या कुछ बीत गई है अलबेला झोंका क्या जाने आस की मैली चादर ओढ़े वो भी था मुझ सा क्या जाने रीत भी अपनी रुत भी अपनी दिल रस्म-ए-दुनिया क्या जाने उँगली थाम के चलने वाला नगरी का रस्ता क्या जाने कितने मोड़ अभी बाक़ी हैं तुम जानो साया क्या जाने कौन खिलौना टूट गया है बालक बे-परवा क्या जाने ममता ओट दहकते सूरज आँखों का तारा क्या जाने

Ada Jafarey

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आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है अहवाल जी का ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन सा है कुछ यादगार अपनी मगर छोड़ कर गईं जाती रुतों का हाल दिलों की लगन सा है आँखें बरस गईं तो निखार और आ गया यादों का रंग भी तो गुल-ओ-यासमन सा है किस मोड़ पर हैं आज हम ऐ रहगुज़ार-ए-नाज़ अब दर्द का मिज़ाज किसी हम-सुख़न सा है है अब भी रंग रंग-ए-तमन्ना का पैरहन ख़्वाबों के साथ अब भी वही हुस्न-ए-ज़न सा है किन मंज़िलों लुटे हैं मोहब्बत के क़ाफ़िले इंसाँ ज़मीं पे आज ग़रीब-उल-वतन सा है वो जिस का साथ छोड़ चुका नाज़-ए-आगही अब भी तलाश-ए-रह में वही राहज़न सा है शाख़ों का रंग-रूप ख़िज़ाँ ले गई मगर अंदाज़ आज भी वही अर्बाब-ए-फ़न सा है ख़ुशबू के थामने को बढ़ाए हैं हाथ 'अदा' दामान-ए-आरज़ू भी सबा-पैरहन सा है

Ada Jafarey

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एक आईना रू-ब-रू है अभी उस की ख़ुश्बू से गुफ़्तुगू है अभी वही ख़ाना-ब-दोश उम्मीदें वही बे-सब्र दिल की ख़ू है अभी दिल के गुंजान रास्तों पे कहीं तेरी आवाज़ और तू है अभी ज़िंदगी की तरह ख़िराज-तलब कोई दरमाँदा आरज़ू है अभी बोलते हैं दिलों के सन्नाटे शोर सा ये जो चार-सू है अभी ज़र्द पत्तों को ले गई है हवा शाख़ में शिद्दत-ए-नुमू है अभी वर्ना इंसान मर गया होता कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी हम-सफ़र भी हैं रहगुज़र भी है ये मुसाफ़िर ही कू-ब-कू है अभी

Ada Jafarey

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आख़िरी टीस आज़माने को जी तो चाहा था मुस्कुराने को याद इतनी भी सख़्त-जाँ तो नहीं इक घरौंदा रहा है ढाने को संग-रेज़ो में ढल गए आँसू लोग हँसते रहे दिखाने को ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता है इक दिया रह गया जलाने को जलने वाले तो जल बुझे आख़िर कौन देता ख़बर ज़माने को कितने मजबूर हो गए होंगे अन-कही बात मुँह पे लाने को खुल के हँसना तो सब को आता है लोग तरसे हैं इक बहाने को रेज़ा रेज़ा बिखर गया इंसाँ दिल की वीरानियाँ जताने को हसरतों की पनाह-गाहों में क्या ठिकाने हैं सर छुपाने को हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी फूल बालों में इक सजाने को आस की बात हो कि साँस 'अदा' ये खिलौने थे टूट जाने को

Ada Jafarey

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