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घर से ये सोच के निकला हूँ कि मर जाना है अब कोई राह दिखा दे कि किधर जाना है जिस्म से साथ निभाने की मत उम्मीद रखो इस मुसाफ़िर को तो रस्ते में ठहर जाना है मौत लम्हे की सदा ज़िंदगी 'उम्रों की पुकार मैं यही सोच के ज़िंदा हूँ कि मर जाना है नश्शा ऐसा था कि मय-ख़ाने को दुनिया समझा होश आया तो ख़याल आया कि घर जाना है मिरे जज़्बे की बड़ी क़द्र है लोगों में मगर मेरे जज़्बे को मिरे साथ ही मर जाना है

Rahat Indori17 Likes

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

Rahat Indori

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फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे आँसुओं में भीगने के बा'द भारी हो गए

Rahat Indori

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सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है हमारे पाँव की मिट्टी ने सर उठाया है हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा था मगर ये कौन है जिस ने समर उठाया है यही ज़मीं में दबाएगा एक दिन हम को ये आसमान जिसे दोश पर उठाया है बुलंदियों को पता चल गया कि फिर मैं ने हवा का टूटा हुआ एक पर उठाया है महा-बली से बग़ावत बहुत ज़रूरी है क़दम ये हम ने समझ सोच कर उठाया है

Rahat Indori

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मेरे कारोबार में सब ने बड़ी इमदाद की दाद लोगों की गला अपना ग़ज़ल उस्ताद की अपनी साँसें बेच कर मैं ने जिसे आबाद की वो गली जन्नत तो अब भी है मगर शद्दाद की उम्र भर चलते रहे आँखों पे पट्टी बाँध कर ज़िंदगी को ढूँडने में ज़िंदगी बर्बाद की दास्तानों के सभी किरदार कम होने लगे आज काग़ज़ चुनती फिरती है परी बग़दाद की इक सुलगता चीख़ता माहौल है और कुछ नहीं बात करते हो 'यगाना' किस अमीनाबाद की

Rahat Indori

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शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया कुछ यादों ने चुटकी में लोबान लिया दरवाज़ों ने अपनी आँखें नम कर लीं दीवारों ने अपना सीना तान लिया प्यास तो अपनी सात समुंदर जैसी थी नाहक़ हम ने बारिश का एहसान लिया मैं ने तलवों से बाँधी थी छाँव मगर शायद मुझ को सूरज ने पहचान लिया कितने सुख से धरती ओढ़ के सोए हैं हम ने अपनी माँ का कहना मान लिया

Rahat Indori

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