गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए आख़िर वो मेरे नक़्श-ए-क़दम पर फ़िदा हुए अब तक तो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ न था कोई तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आश्ना हुए ऐसा नहीं कि दिल ही मुक़ाबिल नहीं रहा तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ भी अक्सर ख़ता हुए मेरी नज़र ने तुम को जमाल-ए-आशना किया मुझ को दुआएँ दो कि तुम इक आईना हुए क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्त-ए-बाहमी मंज़िल हमारी वो तो हम उन का पता हुए अब क्या बताएँ किस की निगाहों की देन थी वो मय कि जिस के पीते ही हम पारसा हुए सुनता हूँ इक मुक़ाम-ए-ज़ियारत है आज कल वो ज़िंदगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए वो आ गए दवाए-ए-ग़म-ए-जाँ लिए हुए लो आज हम भी क़ाइल-ए-दस्त-ए-दुआ हुए कब ज़िंदगी ने हम को नवाज़ा नहीं 'हफ़ीज़' कब हम पे बाब-ए-लुतफ़-ओ-इनायत न वा हुए
Related Ghazal
वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
244 likes
कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
435 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
92 likes
ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
292 likes
More from Hafeez Banarasi
कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँँ है आदमी भीड़ में रहते हुए तन्हा क्यूँँ है पाँव फैलाए हुए ग़म का अँधेरा क्यूँँ है आ गई सुब्ह-ए-तमन्ना तो फिर ऐसा क्यूँँ है मैं तो इक ज़र्रा-ए-नाचीज़ हूँ और कुछ भी नहीं वो जो सूरज है मिरे नाम से जलता क्यूँँ है तुझ को निस्बत है अगर नाम-ए-बराहीम से कुछ आग को फूल समझ आग से डरता क्यूँँ है कौन सा अहद है जिस अहद में हम जीते हैं दश्त तो दश्त है दरिया यहाँ प्यासा क्यूँँ है पी के बहकेगा तो रुस्वाई-ए-महफ़िल होगी वो जो कम-ज़र्फ़ है मयख़ाने में आया क्यूँँ है कोई आसेब है या सिर्फ़ निगाहों का फ़रेब एक साया मुझे हर सू नज़र आता क्यूँँ है याद किस की मह-ओ-ख़ुर्शीद लिए आई है शब-ए-तारीक में आज इतना उजाला क्यूँँ है बद-हवा सेी का ये आलम कभी पहले तो न था हश्र से पहले ही ये हश्र सा बरपा क्यूँँ है
Hafeez Banarasi
2 likes
जब भी तिरी यादों की चलने लगी पुर्वाई हर ज़ख़्म हुआ ताज़ा हर चोट उभर आई इस बात पे हैराँ हैं साहिल के तमाशाई इक टूटी हुई कश्ती हर मौज से टकराई मयख़ाने तक आ पहुँची इंसाफ़ की रुस्वाई साक़ी से हुई लग़्ज़िश रिंदों ने सज़ा पाई हंगामा हुआ बरपा इक जाम अगर टूटा दिल टूट गए लाखों आवाज़ नहीं आई इक रात बसर कर लें आराम से दीवाने ऐसा भी कोई वा'दा ऐ जान-ए-शकेबाई किस दर्जा सितम-गर है ये गर्दिश-ए-दौराँ भी ख़ुद आज तमाशा हैं कल थे जो तमाशाई क्या जानिए क्या ग़म था मिल कर भी ये आलम था बे-ख़्वाब रहे वो भी हम को भी न नींद आई
Hafeez Banarasi
1 likes
इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था वो बहारों के ख़्वाब जैसा था पढ़ लिया हम ने हर्फ़ हर्फ़ उसे उस का चेहरा किताब कैसा था दूर से कुछ था और क़रीब से कुछ हर सहारा सराब जैसा था हम ग़रीबों के वास्ते हर रोज़ एक रोज़-ए-हिसाब जैसा था किस क़दर जल्द उड़ गया यारो वक़्त रंग-ए-शबाब जैसा था कैसे गुज़री है उम्र क्या कहिए लम्हा लम्हा अज़ाब जैसा था ज़हर था ज़िंदगी के साग़र में रंग रंग-ए-शराब जैसा था क्या ज़माना था वो ज़माना भी हर गुनह जब सवाब जैसा था कौन गर्दानता उसे क़ातिल वो तो इज़्ज़त-मआब जैसा था बे-हिजाबी के बावजूद भी कुछ इस के रुख़ पर हिजाब जैसा था जब भी छेड़ा तो इक फ़ुग़ाँ निकली दिल शिकस्ता रबाब जैसा था इस के रुख़ पर नज़र ठहर न सकी वो 'हफ़ीज़' आफ़्ताब जैसा था
Hafeez Banarasi
0 likes
रात का नाम सवेरा ही सही आप कहते हैं तो ऐसा ही सही क्या बुराई है अगर देख लें हम ज़िंदगी एक तमाशा ही सही कुछ तो काँधों पे लिए हैं हम लोग अपने अरमानों का लाशा ही सही पीछे हटना हमें मंज़ूर नहीं सामने आग का दरिया ही सही क्या ज़रूरी है कि मैं नाम भी लूँ मेरा दुश्मन कोई अपना ही सही आइना देख के डर जाता हूँ आइना मेरा शनासा ही सही मेरा क़द आप से ऊँचा है बहुत मैं 'हफ़ीज़' आप का साया ही सही
Hafeez Banarasi
3 likes
ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया बे-चेहरगी की भीड़ में हर चेहरा खो गया जिस को सज़ा मिली थी कि जागे तमाम उम्र सुनता हूँ आज मौत की बाँहों में सो गया हरकत किसी में है न हरारत किसी में है क्या शहर था जो बर्फ़ की चट्टान हो गया मैं उस को नफ़रतों के सिवा कुछ न दे सका वो चाहतों का बीज मिरे दिल में बो गया मरहम तो रख सका न कोई मेरे ज़ख़्म पर जो आया एक निश्तर-ए-ताज़ा चुभो गया या कीजिए क़ुबूल कि हर चेहरा ज़र्द है या कहिए हर निगाह को यरक़ान हो गया मैं ने तो अपने ग़म की कहानी सुनाई थी क्यूँँ अपने अपने ग़म में हर इक शख़्स खो गया उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया इक माह-वश ने चूम ली पेशानी-ए-'हफ़ीज़' दिलचस्प हादसा था जो कल रात हो गया
Hafeez Banarasi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Hafeez Banarasi.
Similar Moods
More moods that pair well with Hafeez Banarasi's ghazal.







