इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था वो बहारों के ख़्वाब जैसा था पढ़ लिया हम ने हर्फ़ हर्फ़ उसे उस का चेहरा किताब कैसा था दूर से कुछ था और क़रीब से कुछ हर सहारा सराब जैसा था हम ग़रीबों के वास्ते हर रोज़ एक रोज़-ए-हिसाब जैसा था किस क़दर जल्द उड़ गया यारो वक़्त रंग-ए-शबाब जैसा था कैसे गुज़री है उम्र क्या कहिए लम्हा लम्हा अज़ाब जैसा था ज़हर था ज़िंदगी के साग़र में रंग रंग-ए-शराब जैसा था क्या ज़माना था वो ज़माना भी हर गुनह जब सवाब जैसा था कौन गर्दानता उसे क़ातिल वो तो इज़्ज़त-मआब जैसा था बे-हिजाबी के बावजूद भी कुछ इस के रुख़ पर हिजाब जैसा था जब भी छेड़ा तो इक फ़ुग़ाँ निकली दिल शिकस्ता रबाब जैसा था इस के रुख़ पर नज़र ठहर न सकी वो 'हफ़ीज़' आफ़्ताब जैसा था
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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अब मजीद उस सेे ये रिश्ता नहीं रखा जाता जिस से इक शख़्स का परदा नहीं रखा जाता एक तो बस में नहीं तुझ से मुहब्बत न करूँ और फिर हाथ भी हल्का नहीं रखा जाता पढ़ने जाता हूँ तो तस्में नहीं बांदे जाते घर पलटता हूँ तो बस्ता नहीं रखा जाता दर-ओ-दीवार पे जंगल का गुमाँ होता है मुझ से अब घर में परिंदा नहीं रखा जाता
Tehzeeb Hafi
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जब भी तिरी यादों की चलने लगी पुर्वाई हर ज़ख़्म हुआ ताज़ा हर चोट उभर आई इस बात पे हैराँ हैं साहिल के तमाशाई इक टूटी हुई कश्ती हर मौज से टकराई मयख़ाने तक आ पहुँची इंसाफ़ की रुस्वाई साक़ी से हुई लग़्ज़िश रिंदों ने सज़ा पाई हंगामा हुआ बरपा इक जाम अगर टूटा दिल टूट गए लाखों आवाज़ नहीं आई इक रात बसर कर लें आराम से दीवाने ऐसा भी कोई वा'दा ऐ जान-ए-शकेबाई किस दर्जा सितम-गर है ये गर्दिश-ए-दौराँ भी ख़ुद आज तमाशा हैं कल थे जो तमाशाई क्या जानिए क्या ग़म था मिल कर भी ये आलम था बे-ख़्वाब रहे वो भी हम को भी न नींद आई
Hafeez Banarasi
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गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए आख़िर वो मेरे नक़्श-ए-क़दम पर फ़िदा हुए अब तक तो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ न था कोई तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आश्ना हुए ऐसा नहीं कि दिल ही मुक़ाबिल नहीं रहा तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ भी अक्सर ख़ता हुए मेरी नज़र ने तुम को जमाल-ए-आशना किया मुझ को दुआएँ दो कि तुम इक आईना हुए क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्त-ए-बाहमी मंज़िल हमारी वो तो हम उन का पता हुए अब क्या बताएँ किस की निगाहों की देन थी वो मय कि जिस के पीते ही हम पारसा हुए सुनता हूँ इक मुक़ाम-ए-ज़ियारत है आज कल वो ज़िंदगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए वो आ गए दवाए-ए-ग़म-ए-जाँ लिए हुए लो आज हम भी क़ाइल-ए-दस्त-ए-दुआ हुए कब ज़िंदगी ने हम को नवाज़ा नहीं 'हफ़ीज़' कब हम पे बाब-ए-लुतफ़-ओ-इनायत न वा हुए
Hafeez Banarasi
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कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँँ है आदमी भीड़ में रहते हुए तन्हा क्यूँँ है पाँव फैलाए हुए ग़म का अँधेरा क्यूँँ है आ गई सुब्ह-ए-तमन्ना तो फिर ऐसा क्यूँँ है मैं तो इक ज़र्रा-ए-नाचीज़ हूँ और कुछ भी नहीं वो जो सूरज है मिरे नाम से जलता क्यूँँ है तुझ को निस्बत है अगर नाम-ए-बराहीम से कुछ आग को फूल समझ आग से डरता क्यूँँ है कौन सा अहद है जिस अहद में हम जीते हैं दश्त तो दश्त है दरिया यहाँ प्यासा क्यूँँ है पी के बहकेगा तो रुस्वाई-ए-महफ़िल होगी वो जो कम-ज़र्फ़ है मयख़ाने में आया क्यूँँ है कोई आसेब है या सिर्फ़ निगाहों का फ़रेब एक साया मुझे हर सू नज़र आता क्यूँँ है याद किस की मह-ओ-ख़ुर्शीद लिए आई है शब-ए-तारीक में आज इतना उजाला क्यूँँ है बद-हवा सेी का ये आलम कभी पहले तो न था हश्र से पहले ही ये हश्र सा बरपा क्यूँँ है
Hafeez Banarasi
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क्या जुर्म हमारा है बता क्यूँँ नहीं देते मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते क्या जल्वा-ए-मअ'नी है दिखा क्यूँँ नहीं देते दीवार-ए-हिजाबात गिरा क्यूँँ नहीं देते तुम को तो बड़ा नाज़-ए-मसीहाई था यारो बीमार है हर शख़्स दवा क्यूँँ नहीं देते किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे हम कान लगाए हैं सदा क्यूँँ नहीं देते कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँँ नहीं देते क्यूँँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँँ नहीं देते कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँँ नहीं देते नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँँ नहीं देते किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे हम कान लगाए हैं सदा क्यूँँ नहीं देते कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँँ नहीं देते क्यूँँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँँ नहीं देते कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँँ नहीं देते नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँँ नहीं देते
Hafeez Banarasi
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ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया बे-चेहरगी की भीड़ में हर चेहरा खो गया जिस को सज़ा मिली थी कि जागे तमाम उम्र सुनता हूँ आज मौत की बाँहों में सो गया हरकत किसी में है न हरारत किसी में है क्या शहर था जो बर्फ़ की चट्टान हो गया मैं उस को नफ़रतों के सिवा कुछ न दे सका वो चाहतों का बीज मिरे दिल में बो गया मरहम तो रख सका न कोई मेरे ज़ख़्म पर जो आया एक निश्तर-ए-ताज़ा चुभो गया या कीजिए क़ुबूल कि हर चेहरा ज़र्द है या कहिए हर निगाह को यरक़ान हो गया मैं ने तो अपने ग़म की कहानी सुनाई थी क्यूँँ अपने अपने ग़म में हर इक शख़्स खो गया उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया इक माह-वश ने चूम ली पेशानी-ए-'हफ़ीज़' दिलचस्प हादसा था जो कल रात हो गया
Hafeez Banarasi
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