ghazalKuch Alfaaz

क्या जुर्म हमारा है बता क्यूँँ नहीं देते  मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते  क्या जल्वा-ए-मअ'नी है दिखा क्यूँँ नहीं देते  दीवार-ए-हिजाबात गिरा क्यूँँ नहीं देते  तुम को तो बड़ा नाज़-ए-मसीहाई था यारो  बीमार है हर शख़्स दवा क्यूँँ नहीं देते  किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे  हम कान लगाए हैं सदा क्यूँँ नहीं देते  कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म  महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँँ नहीं देते  क्यूँँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का  हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँँ नहीं देते  कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं  आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँँ नहीं देते  नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में  दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँँ नहीं देते  किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे  हम कान लगाए हैं सदा क्यूँँ नहीं देते  कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म  महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँँ नहीं देते  क्यूँँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का  हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँँ नहीं देते कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं  आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँँ नहीं देते  नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में  दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँँ नहीं देते

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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जब भी तिरी यादों की चलने लगी पुर्वाई हर ज़ख़्म हुआ ताज़ा हर चोट उभर आई इस बात पे हैराँ हैं साहिल के तमाशाई इक टूटी हुई कश्ती हर मौज से टकराई मयख़ाने तक आ पहुँची इंसाफ़ की रुस्वाई साक़ी से हुई लग़्ज़िश रिंदों ने सज़ा पाई हंगामा हुआ बरपा इक जाम अगर टूटा दिल टूट गए लाखों आवाज़ नहीं आई इक रात बसर कर लें आराम से दीवाने ऐसा भी कोई वा'दा ऐ जान-ए-शकेबाई किस दर्जा सितम-गर है ये गर्दिश-ए-दौराँ भी ख़ुद आज तमाशा हैं कल थे जो तमाशाई क्या जानिए क्या ग़म था मिल कर भी ये आलम था बे-ख़्वाब रहे वो भी हम को भी न नींद आई

Hafeez Banarasi

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ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया बे-चेहरगी की भीड़ में हर चेहरा खो गया जिस को सज़ा मिली थी कि जागे तमाम उम्र सुनता हूँ आज मौत की बाँहों में सो गया हरकत किसी में है न हरारत किसी में है क्या शहर था जो बर्फ़ की चट्टान हो गया मैं उस को नफ़रतों के सिवा कुछ न दे सका वो चाहतों का बीज मिरे दिल में बो गया मरहम तो रख सका न कोई मेरे ज़ख़्म पर जो आया एक निश्तर-ए-ताज़ा चुभो गया या कीजिए क़ुबूल कि हर चेहरा ज़र्द है या कहिए हर निगाह को यरक़ान हो गया मैं ने तो अपने ग़म की कहानी सुनाई थी क्यूँँ अपने अपने ग़म में हर इक शख़्स खो गया उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया इक माह-वश ने चूम ली पेशानी-ए-'हफ़ीज़' दिलचस्प हादसा था जो कल रात हो गया

Hafeez Banarasi

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कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँँ है आदमी भीड़ में रहते हुए तन्हा क्यूँँ है पाँव फैलाए हुए ग़म का अँधेरा क्यूँँ है आ गई सुब्ह-ए-तमन्ना तो फिर ऐसा क्यूँँ है मैं तो इक ज़र्रा-ए-नाचीज़ हूँ और कुछ भी नहीं वो जो सूरज है मिरे नाम से जलता क्यूँँ है तुझ को निस्बत है अगर नाम-ए-बराहीम से कुछ आग को फूल समझ आग से डरता क्यूँँ है कौन सा अहद है जिस अहद में हम जीते हैं दश्त तो दश्त है दरिया यहाँ प्यासा क्यूँँ है पी के बहकेगा तो रुस्वाई-ए-महफ़िल होगी वो जो कम-ज़र्फ़ है मयख़ाने में आया क्यूँँ है कोई आसेब है या सिर्फ़ निगाहों का फ़रेब एक साया मुझे हर सू नज़र आता क्यूँँ है याद किस की मह-ओ-ख़ुर्शीद लिए आई है शब-ए-तारीक में आज इतना उजाला क्यूँँ है बद-हवा सेी का ये आलम कभी पहले तो न था हश्र से पहले ही ये हश्र सा बरपा क्यूँँ है

Hafeez Banarasi

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गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए आख़िर वो मेरे नक़्श-ए-क़दम पर फ़िदा हुए अब तक तो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ न था कोई तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आश्ना हुए ऐसा नहीं कि दिल ही मुक़ाबिल नहीं रहा तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ भी अक्सर ख़ता हुए मेरी नज़र ने तुम को जमाल-ए-आशना किया मुझ को दुआएँ दो कि तुम इक आईना हुए क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्त-ए-बाहमी मंज़िल हमारी वो तो हम उन का पता हुए अब क्या बताएँ किस की निगाहों की देन थी वो मय कि जिस के पीते ही हम पारसा हुए सुनता हूँ इक मुक़ाम-ए-ज़ियारत है आज कल वो ज़िंदगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए वो आ गए दवाए-ए-ग़म-ए-जाँ लिए हुए लो आज हम भी क़ाइल-ए-दस्त-ए-दुआ हुए कब ज़िंदगी ने हम को नवाज़ा नहीं 'हफ़ीज़' कब हम पे बाब-ए-लुतफ़-ओ-इनायत न वा हुए

Hafeez Banarasi

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इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था वो बहारों के ख़्वाब जैसा था पढ़ लिया हम ने हर्फ़ हर्फ़ उसे उस का चेहरा किताब कैसा था दूर से कुछ था और क़रीब से कुछ हर सहारा सराब जैसा था हम ग़रीबों के वास्ते हर रोज़ एक रोज़-ए-हिसाब जैसा था किस क़दर जल्द उड़ गया यारो वक़्त रंग-ए-शबाब जैसा था कैसे गुज़री है उम्र क्या कहिए लम्हा लम्हा अज़ाब जैसा था ज़हर था ज़िंदगी के साग़र में रंग रंग-ए-शराब जैसा था क्या ज़माना था वो ज़माना भी हर गुनह जब सवाब जैसा था कौन गर्दानता उसे क़ातिल वो तो इज़्ज़त-मआब जैसा था बे-हिजाबी के बावजूद भी कुछ इस के रुख़ पर हिजाब जैसा था जब भी छेड़ा तो इक फ़ुग़ाँ निकली दिल शिकस्ता रबाब जैसा था इस के रुख़ पर नज़र ठहर न सकी वो 'हफ़ीज़' आफ़्ताब जैसा था

Hafeez Banarasi

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