ghazalKuch Alfaaz

हाँ मददगार की ज़रूरत है छत हूँ दीवार की ज़रूरत है आप की नफ़रतें बताती हैं आप को प्यार की ज़रूरत है तुम तो लफ़्ज़ों से मार देते हो तुम को हथियार की ज़रूरत है? जीत ने अंधा कर दिया है तुझे तुझ को इक हार की ज़रूरत है एक बिस्तर का इश्तिहार पढ़ा एक बीमार की ज़रूरत है मैं भी एक बार था ज़रूरी उसे तू भी इक बार की ज़रूरत है इश्क़ तो एक से ही होता है तुझ को दो चार की ज़रूरत है

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए

Varun Anand

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मरहम के नहीं हैं ये तरफ़-दार नमक के निकले हैं मिरे ज़ख़्म तलबगार नमक के आया कोई सैलाब कहानी में अचानक और घुल गए पानी में वो किरदार नमक के दोनों ही किनारों पे थी बीमारों की मज्लिस इस पार थे मीठे के तो उस पार नमक के उस ने ही दिए ज़ख़्म ये गर्दन पे हमारी फिर उस ने ही पहनाए हमें हार नमक के कहती थी ग़ज़ल मुझ को है मरहम की ज़रूरत और देते रहे सब उसे अश'आर नमक के जिस सम्त मिला करती थीं ज़ख़्मों की दवाएँ सुनते हैं कि अब हैं वहाँ बाज़ार नमक के

Varun Anand

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कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए

Varun Anand

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ये शोख़ियाँ ये जवानी कहाँ से लाएँ हम तुम्हारे हुस्न का सानी कहाँ से लाएँ हम मोहब्बतें वो पुरानी कहाँ से लाएँ हम रुकी नदी में रवानी कहाँ से लाएँ हम हमारी आँख है पैवस्त एक सहरा में अब ऐसी आँख में पानी कहाँ से लाएँ हम हर एक लफ़्ज़ के मा'नी तलाशते हो तुम हर एक लफ़्ज़ का मा'नी कहाँ से लाएँ हम चलो बता दें ज़माने को अपने बारे में कि रोज़ झूटी कहानी कहाँ से लाएँ हम

Varun Anand

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वफ़ा, ख़ुलूस, मदद, देखभाल भूल गए अब ऐसे लफ़्ज़ों का सब इस्तिमाल भूल गए मनाना रूठना हिज्र-ओ-विसाल भूल गए सभी मोहब्बतों का इस्तिमाल भूल गए नज़र के सामने वो बा-कमाल क्या आया हम अपने हिस्से के सारे कमाल भूल गए क़फ़स में लग गया जी आख़िरश परिंदों का जहाँ से आए थे वो डाल-वाल भूल गए फ़ुतूर फिर से चढ़ा है नई मुहब्बत का जनाब पिछली मुहब्बत का हाल भूल गए? फिर उस ने सोच समझ कर इक ऐसी चाल चली कि जिस को देख के सब अपनी चाल भूल गए दिए जलाने थे पर दिल जला दिए हम ने हम अपने फ़न का सही इस्तिमाल भूल गए

Varun Anand

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