है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहाँ हैं दौर-ए-जाम-ए-अव्वल-ए-शब में ख़ुदी से दूर होती है आज देखिए हम को सहर कहाँ या रब इस इख़्तिलात का अंजाम हो ब-ख़ैर था उस को हम से रब्त मगर इस क़दर कहाँ इक उम्र चाहिए कि गवारा हो नीश-ए-इश्क़ रक्खी है आज लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर कहाँ बस हो चुका बयाँ कसल-ओ-रंज-ए-राह का ख़त का मिरे जवाब है ऐ नामा-बर कहाँ कौन ओ मकाँ से है दिल-ए-वहशी कनारा-गीर इस ख़ानुमाँ-ख़राब ने ढूँडा है घर कहाँ हम जिस पे मर रहे हैं वो है बात ही कुछ और आलम में तुझ से लाख सही तू मगर कहाँ होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ 'हाली' नशात-ए-नग़्मा-ओ-मय ढूँढ़ते हो अब आए हो वक़्त-ए-सुब्ह रहे रात भर कहाँ
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ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिले सफे आवारगी नहीं लगता कभी-कभी वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी-कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहाँ से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बौसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता तेरे ख़याल से आगे भी एक दुनिया है तेरा ख़याल मुझे सरसरी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता
Tehzeeb Hafi
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तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शे'र ताज़ा कोई हुआ ही नहीं रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँडा जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं याद है जो उसी को याद करो हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं
Fahmi Badayuni
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जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो फिर मुक़र्रिर कोई सरगर्म सर-ए-मिंबर है किस के है क़त्ल का सामान ज़रा देख तो लो ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने क्यूँँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँँ है तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो ये सताइश की तमन्ना ये सिले की परवाह कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो
Javed Akhtar
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दिल मोहब्बत में मुब्तला हो जाए जो अभी तक न हो सका हो जाए तुझ में ये ऐब है कि ख़ूबी है जो तुझे देख ले तिरा हो जाए ख़ुद को ऐसी जगह छुपाया है कोई ढूँढ़े तो लापता हो जाए मैं तुझे छोड़ कर चला जाऊँ साया दीवार से जुदा हो जाए बस वो इतना कहे मुझे तुम से और फिर कॉल मुंक़ता' हो जाए दिल भी कैसा दरख़्त है 'हाफ़ी' जो तिरी याद से हरा हो जाए
Tehzeeb Hafi
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हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाए कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए अजब हालात थे यूँँ दिल का सौदा हो गया आख़िर मोहब्बत की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाए समुंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दे हम को हवाएँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाए मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
Bashir Badr
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ख़ूबियाँ अपने में गो बे-इंतिहा पाते हैं हम पर हर इक ख़ूबी में दाग़ इक ऐब का पाते हैं हम ख़ौफ़ का कोई निशाँ ज़ाहिर नहीं अफ़आ'ल में गो कि दिल में मुत्तसिल ख़ौफ़-ए-ख़ुदा पाते हैं हम करते हैं ताअ'त तो कुछ ख़्वाहाँ नुमाइश के नहीं पर गुनह छुप छुप के करने में मज़ा पाते हैं हम दीदा ओ दिल को ख़यानत से नहीं रख सकते बाज़ गरचे दस्त-ओ-पा को अक्सर बे-ख़ता पाते हैं हम दिल में दर्द-ए-इश्क़ ने मुद्दत से कर रक्खा है घर पर उसे आलूदा-ए-हिर्स-ओ-हवा पाते हैं हम हो के नादिम जुर्म से फिर जुर्म करते हैं वही जुर्म से गो आप को नादिम सदा पाते हैं हम हैं फ़िदा उन दोस्तों पर जिन में हो सिद्क़ ओ सफ़ा पर बहुत कम आप में सिद्क़ ओ सफ़ा पाते हैं हम गो किसी को आप से होने नहीं देते ख़फ़ा इक जहाँ से आप को लेकिन ख़फ़ा पाते हैं हम जानते अपने सिवा सब को हैं बे-मेहर ओ वफ़ा अपने में गर शम्मा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा पाते हैं हम बुख़्ल से मंसूब करते हैं ज़माने को सदा गर कभी तौफ़ीक़-ए-ईसार ओ अता पाते हैं हम हो अगर मक़्सद में नाकामी तो कर सकते हैं सब्र दर्द-ए-ख़ुद-कामी को लेकिन बे-दवा पाते हैं हम ठहरते जाते हैं जितने चश्म-ए-आलम में भले हाल नफ़्स-ए-दूँ का उतना ही बुरा पाते हैं हम जिस क़दर झुक झुक के मिलते हैं बुज़ुर्ग ओ ख़ुर्द से किब्र ओ नाज़ उतना ही अपने में सिवा पाते हैं हम गो भलाई कर के हम-जिंसों से ख़ुश होता है जी तह-नशीं उस में मगर दुर्द-ए-रिया पाते हैं हम है रिदा-ए-नेक-नामी दोश पर अपने मगर दाग़ रुस्वाई के कुछ ज़ेर-ए-रिदा पाते हैं हम राह के तालिब हैं पर बे-राह पड़ते हैं क़दम देखिए क्या ढूँढ़ते हैं और क्या पाते हैं हम नूर के हम ने गले देखे हैं ऐ 'हाली' मगर रंग कुछ तेरी अलापों में नया पाते हैं हम
Altaf Hussain Hali
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इश्क़ को तर्क-ए-जुनूँ से क्या ग़रज़ चर्ख़-ए-गर्दां को सुकूँ से क्या ग़रज़ दिल में है ऐ ख़िज़्र गर सिदक़-ए-तलब राह-रौ को रहनुमों से क्या ग़रज़ हाजियो है हम को घर वाले से काम घर के मेहराब ओ सुतूँ से क्या ग़रज़ गुनगुना कर आप रो पड़ते हैं जो उन को चंग ओ अरग़नूँ से क्या ग़रज़ नेक कहना नेक जिस को देखना हम को तफ़्तीश-ए-दरूँ से क्या ग़रज़ दोस्त हैं जब ज़ख़्म-ए-दिल से बे-ख़बर उन को अपने अश्क-ए-ख़ूँ से क्या ग़रज़ इश्क़ से है मुजतनिब ज़ाहिद अबस शे'र को सैद-ए-ज़बूँ से क्या ग़रज़ कर चुका जब शैख़ तस्ख़ीर-ए-क़ुलूब अब उसे दुनिया-ए-दूँ से क्या ग़रज़ आए हो 'हाली' पए-तस्लीम याँ आप को चून-ओ-चगूँ से क्या ग़रज़
Altaf Hussain Hali
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मैं तो मैं ग़ैर को मरने से अब इनकार नहीं इक क़यामत है तिरे हाथ में तलवार नहीं कुछ पता मंज़िल-ए-मक़्सूद का पाया हम ने जब ये जाना कि हमें ताक़त-ए-रफ़्तार नहीं चश्म-ए-बद-दूर बहुत फिरते हैं अग़्यार के साथ ग़ैरत-ए-इश्क़ से अब तक वो ख़बर-दार नहीं हो चुका नाज़ उठाने में है गो काम तमाम लिल्लाहिल-हम्द कि बाहम कोई तकरार नहीं मुद्दतों रश्क ने अग़्यार से मिलने न दिया दिल ने आख़िर ये दिया हुक्म कि कुछ आर नहीं अस्ल मक़्सूद का हर चीज़ में मिलता है पता वर्ना हम और किसी शय के तलबगार नहीं बात जो दिल में छुपाते नहीं बनती 'हाली' सख़्त मुश्किल है कि वो क़ाबिल-ए-इज़हार नहीं
Altaf Hussain Hali
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गो जवानी में थी कज-राई बहुत पर जवानी हम को याद आई बहुत ज़ेर-ए-बुर्क़ा तू ने क्या दिखला दिया जम्अ'' हैं हर सू तमाशाई बहुत हट पे इस की और पिस जाते हैं दिल रास है कुछ उस को ख़ुद-राई बहुत सर्व या गुल आँख में जचते नहीं दिल पे है नक़्श उस की रा'नाई बहुत चूर था ज़ख़्मों में और कहता था दिल राहत इस तकलीफ़ में पाई बहुत आ रही है चाह-ए-यूसुफ़ से सदा दोस्त याँ थोड़े हैं और भाई बहुत वस्ल के हो हो के सामाँ रह गए मेंह न बरसा और घटा छाई बहुत जाँ-निसारी पर वो बोल उट्ठे मिरी हैं फ़िदाई कम तमाशाई बहुत हम ने हर अदना को आला कर दिया ख़ाकसारी अपनी काम आई बहुत कर दिया चुप वाक़िआत-ए-दहर ने थी कभी हम में भी गोयाई बहुत घट गईं ख़ुद तल्ख़ियाँ अय्याम की या गई कुछ बढ़ शकेबाई बहुत हम न कहते थे कि 'हाली' चुप रहो रास्त-गोई में है रुस्वाई बहुत
Altaf Hussain Hali
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हक़ वफ़ा के जो हम जताने लगे आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे था यहाँ दिल में तान-ए-वस्ल-ए-अदू उज़्र उन की ज़बाँ पे आने लगे हम को जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में वो अगर हिम्मत आज़माने लगे डर है मेरी ज़बाँ न खुल जाए अब वो बातें बहुत बनाने लगे जान बचती नज़र नहीं आती ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे तुम को करना पड़ेगा उज़्र-ए-जफ़ा हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम हम भी आख़िर को जी चुराने लगे जी में है लूँ रज़ा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ क़ाफ़िले फिर हरम को जाने लगे सिर्र-ए-बातिन को फ़ाश कर या रब अहल-ए-ज़ाहिर बहुत सताने लगे वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त 'हाली' पर हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे
Altaf Hussain Hali
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