ghazalKuch Alfaaz

हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है बहार चेहरे पे दिल में ख़िज़ाँ का दफ़्तर है न हम-सफ़र न कोई नक़्श-ए-पा न रहबर है जुनूँ की राह में कुछ है तो जान का डर है हर एक लम्हा हमें डर है टूट जाने का ये ज़िंदगी है कि बोसीदा काँच का घर है इसी से लड़ते हुए एक उम्र बीत गई मेरी अना ही मेरे रास्ते का पत्थर है तमाम जिस्म हैं जिस के ख़याल में लर्ज़ां वो तीरगी का नहीं रौशनी का ख़ंजर है मैं एक क़तरा हूँ लेकिन मेरा नसीब तो देख कि बे-क़रार मेरे ग़म में इक समुंदर है उसी के पीछे रवाँ हूँ मैं पागलों की तरह वो एक शय जो मेरी दस्तरस से बाहर है इसी ख़याल से मिलता है कुछ सुकूँ दिल को कि ना-सुबूरी तो इस दौर का मुक़द्दर है कभी तो इस से मुलाक़ात की घड़ी आए जो मेरे दिल में बसा है जो मेरे अंदर है उक़ाब-ए-ज़ुल्म के पंजे अभी कहाँ टूटे अभी तो फ़ाख़्ता-ए-अमन ख़ून में तर है ख़ुदा की मार हो इस जेहल-ए-आगही पे 'हफ़ीज़' ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद यहाँ हर शख़्स इक पयम्बर है

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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गले तो लगना है उस सेे कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए अगर कोई तेरी रफ़्तार मापने निकले दिमाग़ क्या है जहानों की रौशनी लग जाए तू हाथ उठा नहीं सकता तो मेरा हाथ पकड़ तुझे दुआ नहीं लगती तो शा'इरी लग जाए पता करूँँगा अँधेरे में किस से मिलता है और इस अमल में मुझे चाहे आग भी लग जाए हमारे हाथ ही जलते रहेंगे सिगरेट से? कभी तुम्हारे भी कपड़ों पे इस्त्री लग जाए हर एक बात का मतलब निकालने वालों तुम्हारे नाम के आगे न मतलबी लग जाए क्लासरूम हो या हश्र कैसे मुमकिन है हमारे होते तेरी ग़ैर-हाज़िरी लग जाए मैं पिछले बीस बरस से तेरी गिरफ़्त में हूँ के इतने देर में तो कोई आई. जी. लग जाए

Tehzeeb Hafi

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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या

Jaun Elia

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किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती फूल क्यूँँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम

Ahmad Faraz

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चेहरे पे ख़ुशी छा जाती है आँखों में सुरूर आ जाता है जब तुम मुझे अपना कहते हो अपने पे ग़ुरूर आ जाता है तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर आ जाता है हम पास से तुम को क्या देखें तुम जब भी मुक़ाबिल होते हो बेताब निगाहों के आगे पर्दा सा ज़रूर आ जाता है जब तुम से मोहब्बत की हम ने तब जा के कहीं ये राज़ खुला मरने का सलीक़ा आते ही जीने का शुऊ'र आ जाता है

Sahir Ludhianvi

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जब भी तिरी यादों की चलने लगी पुर्वाई हर ज़ख़्म हुआ ताज़ा हर चोट उभर आई इस बात पे हैराँ हैं साहिल के तमाशाई इक टूटी हुई कश्ती हर मौज से टकराई मयख़ाने तक आ पहुँची इंसाफ़ की रुस्वाई साक़ी से हुई लग़्ज़िश रिंदों ने सज़ा पाई हंगामा हुआ बरपा इक जाम अगर टूटा दिल टूट गए लाखों आवाज़ नहीं आई इक रात बसर कर लें आराम से दीवाने ऐसा भी कोई वा'दा ऐ जान-ए-शकेबाई किस दर्जा सितम-गर है ये गर्दिश-ए-दौराँ भी ख़ुद आज तमाशा हैं कल थे जो तमाशाई क्या जानिए क्या ग़म था मिल कर भी ये आलम था बे-ख़्वाब रहे वो भी हम को भी न नींद आई

Hafeez Banarasi

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कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँँ है आदमी भीड़ में रहते हुए तन्हा क्यूँँ है पाँव फैलाए हुए ग़म का अँधेरा क्यूँँ है आ गई सुब्ह-ए-तमन्ना तो फिर ऐसा क्यूँँ है मैं तो इक ज़र्रा-ए-नाचीज़ हूँ और कुछ भी नहीं वो जो सूरज है मिरे नाम से जलता क्यूँँ है तुझ को निस्बत है अगर नाम-ए-बराहीम से कुछ आग को फूल समझ आग से डरता क्यूँँ है कौन सा अहद है जिस अहद में हम जीते हैं दश्त तो दश्त है दरिया यहाँ प्यासा क्यूँँ है पी के बहकेगा तो रुस्वाई-ए-महफ़िल होगी वो जो कम-ज़र्फ़ है मयख़ाने में आया क्यूँँ है कोई आसेब है या सिर्फ़ निगाहों का फ़रेब एक साया मुझे हर सू नज़र आता क्यूँँ है याद किस की मह-ओ-ख़ुर्शीद लिए आई है शब-ए-तारीक में आज इतना उजाला क्यूँँ है बद-हवा सेी का ये आलम कभी पहले तो न था हश्र से पहले ही ये हश्र सा बरपा क्यूँँ है

Hafeez Banarasi

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गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए आख़िर वो मेरे नक़्श-ए-क़दम पर फ़िदा हुए अब तक तो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ न था कोई तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आश्ना हुए ऐसा नहीं कि दिल ही मुक़ाबिल नहीं रहा तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ भी अक्सर ख़ता हुए मेरी नज़र ने तुम को जमाल-ए-आशना किया मुझ को दुआएँ दो कि तुम इक आईना हुए क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्त-ए-बाहमी मंज़िल हमारी वो तो हम उन का पता हुए अब क्या बताएँ किस की निगाहों की देन थी वो मय कि जिस के पीते ही हम पारसा हुए सुनता हूँ इक मुक़ाम-ए-ज़ियारत है आज कल वो ज़िंदगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए वो आ गए दवाए-ए-ग़म-ए-जाँ लिए हुए लो आज हम भी क़ाइल-ए-दस्त-ए-दुआ हुए कब ज़िंदगी ने हम को नवाज़ा नहीं 'हफ़ीज़' कब हम पे बाब-ए-लुतफ़-ओ-इनायत न वा हुए

Hafeez Banarasi

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ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया बे-चेहरगी की भीड़ में हर चेहरा खो गया जिस को सज़ा मिली थी कि जागे तमाम उम्र सुनता हूँ आज मौत की बाँहों में सो गया हरकत किसी में है न हरारत किसी में है क्या शहर था जो बर्फ़ की चट्टान हो गया मैं उस को नफ़रतों के सिवा कुछ न दे सका वो चाहतों का बीज मिरे दिल में बो गया मरहम तो रख सका न कोई मेरे ज़ख़्म पर जो आया एक निश्तर-ए-ताज़ा चुभो गया या कीजिए क़ुबूल कि हर चेहरा ज़र्द है या कहिए हर निगाह को यरक़ान हो गया मैं ने तो अपने ग़म की कहानी सुनाई थी क्यूँँ अपने अपने ग़म में हर इक शख़्स खो गया उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया इक माह-वश ने चूम ली पेशानी-ए-'हफ़ीज़' दिलचस्प हादसा था जो कल रात हो गया

Hafeez Banarasi

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क्या जुर्म हमारा है बता क्यूँँ नहीं देते  मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते  क्या जल्वा-ए-मअ'नी है दिखा क्यूँँ नहीं देते  दीवार-ए-हिजाबात गिरा क्यूँँ नहीं देते  तुम को तो बड़ा नाज़-ए-मसीहाई था यारो  बीमार है हर शख़्स दवा क्यूँँ नहीं देते  किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे  हम कान लगाए हैं सदा क्यूँँ नहीं देते  कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म  महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँँ नहीं देते  क्यूँँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का  हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँँ नहीं देते  कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं  आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँँ नहीं देते  नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में  दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँँ नहीं देते  किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे  हम कान लगाए हैं सदा क्यूँँ नहीं देते  कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म  महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँँ नहीं देते  क्यूँँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का  हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँँ नहीं देते कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं  आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँँ नहीं देते  नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में  दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँँ नहीं देते

Hafeez Banarasi

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