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हमारे शौक़ की ये इंतिहा थी क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी बिछड़ के डार से बन बन फिरा वो हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी मोहब्बत मर गई मुझ को भी ग़म है मिरे अच्छे दिनों की आश्ना थी जिसे छू लूँ मैं वो हो जाए सोना तुझे देखा तो जाना बद-दुआ' थी मरीज़-ए-ख़्वाब को तो अब शिफ़ा है मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी

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शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें तुम सर-ब-सर ख़ुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें मैं अपने आप में न मिला इस का ग़म नहीं ग़म तो ये है कि तुम भी बहुत कम मिले तुम्हें तुम को जहान-ए-शौक़-ओ-तमन्ना में क्या मिला हम भी मिले तो दरहम ओ बरहम मिले तुम्हें यूँँ हो कि और ही कोई हव्वा मिले मुझे हो यूँँ कि और ही कोई आदम मिले तुम्हें

Jaun Elia

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मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते

Nawaz Deobandi

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दर्द सीने में छुपाए रक्खा हम ने माहौल बनाए रक्खा मौत आई थी कई दिन पहले उस को बातों में लगाए रक्खा दश्त में आई बला टलने तक शोर चिड़ियों ने मचाए रक्खा वरना तारों को शिकायत होती हम ने हर ज़ख़्म छुपाए रक्खा काम दुश्वार था फिर भी दानिश ख़ुद को आसान बनाए रक्खा

Madan Mohan Danish

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समुंदर उल्टा सीधा बोलता है सलीक़े से तो प्यासा बोलता है यहाँ तो उस का पैसा बोलता है वहाँ देखेंगे वो क्या बोलता है तुम्हारे साथ उड़ाने बोलती है हमारे साथ पिंजरा बोलता है निगाहें करती रह जाती हैं हिज्जे वो जब चेहरे से इमला बोलता है मैं चुप रहता हूँ इतना बोल कर भी तू चुप रह कर भी कितना बोलता है मैं हर शाइ'र में ये भी देखता हूँ बिना माइक के वो क्या बोलता है

Fahmi Badayuni

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तितली से दोस्ती न गुलाबों का शौक़ है मेरी तरह उसे भी किताबों का शौक़ है वर्ना तो नींद से भी नहीं कोई ख़ास रब्त आँखों को सिर्फ़ आप के ख़्वाबों का शौक़ है हम आशिक़-ए-ग़ज़ल हैं तो मग़रूर क्यूँ न हों आख़िर ये शौक़ भी तो नवाबों का शौक़ है उस शख़्स के फ़रेब से वाक़िफ़ हैं हम मगर कुछ अपनी प्यास को ही सराबों का शौक़ है गिरने दो ख़ुद सँभलने दो ऐसे ही चलने दो ये तो 'चराग़' ख़ाना-ख़राबों का शौक़ है

Charagh Sharma

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हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है मगर वो बात पहले सी नहीं है मुझे मायूस भी करती नहीं है यही आदत तिरी अच्छी नहीं है बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत में मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे कभी हम ने मोहब्बत की नहीं है है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया मफ़र ग़म से यहाँ कोई नहीं है

Javed Akhtar

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खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा ख़ुलूस तो है मगर ए'तिबार जाता रहा किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा अजब सा चैन था हम को कि जब थे हम बेचैन क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महफ़िल में मैं ये उमीद लिए बार बार जाता रहा

Javed Akhtar

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वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है जो मुझ को ज़िंदा जला रहे हैं वो बे-ख़बर हैं कि मेरी ज़ंजीर धीरे धीरे पिघल रही है मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है न जलने पाते थे जिस के चूल्हे भी हर सवेरे सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है मैं जानता हूँ कि ख़ामुशी में ही मस्लहत है मगर यही मस्लहत मिरे दिल को खल रही है कभी तो इंसान ज़िंदगी की करेगा इज़्ज़त ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है

Javed Akhtar

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इक पल ग़मों का दरिया, इक पल ख़ुशी का दरिया रूकता नहीं कभी भी, ये ज़िन्‍दगी का दरिया आँखें थीं वो किसी की, या ख़्वाब की ज़ंजीरें आवाज़ थी किसी की या रागिनी का दरिया इस दिल की वादियों में, अब ख़ाक उड़ रही है बहता यहीं था पहले, इक आशिक़ी का दरिया किरनों में हैं ये लहरें, या लहरों में हैं किरनें दरिया की चाँदनी है, या चाँदनी का दरिया

Javed Akhtar

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सच ये है बे-कार हमें ग़म होता है जो चाहा था दुनिया में कम होता है ढलता सूरज फैला जंगल रस्ता गुम हम से पूछो कैसा आलम होता है ग़ैरों को कब फ़ुर्सत है दुख देने की जब होता है कोई हमदम होता है ज़ख़्म तो हम ने इन आँखों से देखे हैं लोगों से सुनते हैं मरहम होता है ज़ेहन की शाख़ों पर अश'आर आ जाते हैं जब तेरी यादों का मौसम होता है

Javed Akhtar

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