दर्द सीने में छुपाए रक्खा हम ने माहौल बनाए रक्खा मौत आई थी कई दिन पहले उस को बातों में लगाए रक्खा दश्त में आई बला टलने तक शोर चिड़ियों ने मचाए रक्खा वरना तारों को शिकायत होती हम ने हर ज़ख़्म छुपाए रक्खा काम दुश्वार था फिर भी दानिश ख़ुद को आसान बनाए रक्खा
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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कोई काँटा न हो गुलाबों में ऐसा मुमकिन है सिर्फ़ ख़्वाबों में दिल को कैसे क़रार आता है ये लिखा ही नहीं किताबों में इतने सीधे सवाल थे मेरे वो उलझता गया जवाबों में मैं ही उस का ग़ुरूर था दानिश और मुझी को रखा ख़राबों में
Madan Mohan Danish
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ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए मगर फिर भी मुझे रोका न जाए बदल सकती है रुख़ तस्वीर अपना कुछ इतने ग़ौर से देखा न जाए उलझने के लिए सौ उलझनें हैं बस अपने आप से उलझा न जाए इरादा वापसी का हो अगर तो बहुत गहराई में उतरा न जाए हमारी अर्ज़ बस इतनी है 'दानिश' उदासी का सबब पूछा न जाए
Madan Mohan Danish
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तुम अपने आप पर एहसान क्यूँँ नहीं करते किया है इश्क़ तो एलान क्यूँँ नहीं करते सजाए फिरते हो महफ़िल न जाने किस किस की कभी परिंदों को मेहमान क्यूँँ नहीं करते वो देखते ही नहीं जो है मंज़रों से अलग कभी निगाह को हैरान क्यूँँ नहीं करते पुरानी सम्तों में चलने की सब को आदत है नई दिशाओं का वो ध्यान क्यूँँ नहीं करते बस इक चराग़ के बुझने से बुझ गए 'दानिश' तुम आंधियों को परेशान क्यूँँ नहीं करते
Madan Mohan Danish
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और क्या आख़िर तुझे ऐ ज़िंदगानी चाहिए आरज़ू कल आग की थी आज पानी चाहिए ये कहाँ की रीत है जागे कोई सोए कोई रात सब की है तो सब को नींद आनी चाहिए इस को हँसने के लिए तो उस को रोने के लिए वक़्त की झोली से सब को इक कहानी चाहिए क्यूँँ ज़रूरी है किसी के पीछे पीछे हम चलें जब सफ़र अपना है तो अपनी रवानी चाहिए कौन पहचानेगा 'दानिश' अब तुझे किरदार से बे-मुरव्वत वक़्त को ताज़ा निशानी चाहिए
Madan Mohan Danish
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कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला फ़िक्र हर बार ख़मोशी से मिली है मुझ को और ज़माना ये मुझे शोर मचाने से मिला उस की तक़दीर अँधेरों ने लिखी थी शायद वो उजाला जो चराग़ों को बुझाने से मिला पूछते क्या हो मिला कैसे ये जंगल को तिलिस्म छाँव में धूप की रंगत को मिलाने से मिला और लोगों से मुलाक़ात कहाँ मुमकिन थी वो तो ख़ुद से भी मिला है तो बहाने से मिला मेरी तश्कील तो कुछ और हुई थी 'दानिश' ये नया नक़्श मुझे ख़ुद को मिटाने से मिला
Madan Mohan Danish
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