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कोई काँटा न हो  गुलाबों में  ऐसा मुमकिन है सिर्फ़ ख़्वाबों में  दिल को कैसे क़रार आता है  ये लिखा ही नहीं किताबों में  इतने सीधे सवाल थे मेरे  वो उलझता गया जवाबों में  मैं ही उस का ग़ुरूर था दानिश  और मुझी को रखा  ख़राबों में

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला फ़िक्र हर बार ख़मोशी से मिली है मुझ को और ज़माना ये मुझे शोर मचाने से मिला उस की तक़दीर अँधेरों ने लिखी थी शायद वो उजाला जो चराग़ों को बुझाने से मिला पूछते क्या हो मिला कैसे ये जंगल को तिलिस्म छाँव में धूप की रंगत को मिलाने से मिला और लोगों से मुलाक़ात कहाँ मुमकिन थी वो तो ख़ुद से भी मिला है तो बहाने से मिला मेरी तश्कील तो कुछ और हुई थी 'दानिश' ये नया नक़्श मुझे ख़ुद को मिटाने से मिला

Madan Mohan Danish

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ये माना उस तरफ़ रस्ता न जाए मगर फिर भी मुझे रोका न जाए बदल सकती है रुख़ तस्वीर अपना कुछ इतने ग़ौर से देखा न जाए उलझने के लिए सौ उलझनें हैं बस अपने आप से उलझा न जाए इरादा वापसी का हो अगर तो बहुत गहराई में उतरा न जाए हमारी अर्ज़ बस इतनी है 'दानिश' उदासी का सबब पूछा न जाए

Madan Mohan Danish

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हम अपने दुख को गाने लग गए हैं मगर इस में ज़माने लग गए हैं किसी की तर्बियत का है करिश्मा ये आँसू मुस्कुराने लग गए हैं कहानी रुख़ बदलना चाहती है नए किरदार आने लग गए हैं ये हासिल है मिरी ख़ामोशियों का कि पत्थर आज़माने लग गए हैं ये मुमकिन है किसी दिन तुम भी आओ परिंदे आने जाने लग गए हैं जिन्हें हम मंज़िलों तक ले के आए वही रस्ता बताने लग गए हैं शराफ़त रंग दिखलाती है 'दानिश' कई दुश्मन ठिकाने लग गए हैं

Madan Mohan Danish

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तुम अपने आप पर एहसान क्यूँँ नहीं करते किया है इश्क़ तो एलान क्यूँँ नहीं करते सजाए फिरते हो महफ़िल न जाने किस किस की कभी परिंदों को मेहमान क्यूँँ नहीं करते वो देखते ही नहीं जो है मंज़रों से अलग कभी निगाह को हैरान क्यूँँ नहीं करते पुरानी सम्तों में चलने की सब को आदत है नई दिशाओं का वो ध्यान क्यूँँ नहीं करते बस इक चराग़ के बुझने से बुझ गए 'दानिश' तुम आंधियों को परेशान क्यूँँ नहीं करते

Madan Mohan Danish

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पत्थर पहले ख़ुद को पत्थर करता है उस के बा'द ही कुछ कारीगर करता है एक ज़रा सी कश्ती ने ललकारा है अब देखें क्या ढोंग समुंदर करता है कान लगा कर मौसम की बातें सुनिए क़ुदरत का सब हाल उजागर करता है उस की बातों में रस कैसे पैदा हो बात बहुत ही सोच-समझकर करता है जिस को देखो 'दानिश' का दीवाना है क्या वो कोई जादू-मंतर करता है

Madan Mohan Danish

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