हर बार हुआ है जो वही तो नहीं होगा डर जिस का सताता है अभी तो नहीं होगा दुनिया को चलो परखें नए दोस्त बनाएँ हर शख़्स ज़माने में वही तो नहीं होगा वो शख़्स बड़ा है तो ग़लत हो नहीं सकता दुनिया को भरोसा ये अभी तो नहीं होगा है उस का इशारा भी समझने की ज़रूरत होगा तो कभी होगा अभी तो नहीं होगा दो-चार गड़े मुर्दे उखाड़ेंगे किसी रोज़ हर बार नया झगड़ा कभी तो नहीं होगा कुछ और भी हो सकता है तक़रीर का मतलब जो आप ने समझा है वही तो नहीं होगा हर बार ज़माने का सितम होगा मुझी पर हाँ मैं ही बदल जाऊँ कभी तो नहीं होगा
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अंगारों में खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में
Aalok Shrivastav
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घर की बुनियादें दीवारें बाम-ओ-दर थे बाबू जी सब को बाँध के रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी तीन मोहल्लों में उन जैसी क़द काठी का कोई न था अच्छे-ख़ासे ऊँचे पूरे क़द-आवर थे बाबू जी अब तो उस सूने माथे पर कोरे-पन की चादर है अम्मा जी की सारी सज-धज सब ज़ेवर थे बाबू जी भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता अलग अनूठा अनबूझा सा इक तेवर थे बाबू जी कभी बड़ा सा हाथ-ख़र्च थे कभी हथेली की सूजन मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबू जी
Aalok Shrivastav
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किसी और ने तो बुना नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ तिरे आसमाँ से जुदा नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ ये ज़मीन मेरी ज़मीन है ये जहान मेरा जहान है किसी दूसरे से मिला नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ कहीं धूप है कहीं चाँदनी कहीं रंग है कहीं रौशनी कहीं आँसुओं से धुला नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ उसे छू सकूँ ये जुनून है मेरी रूह को ये सुकून है यहाँ कब किसी का हुआ नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ गिरीं बिजलियाँ मेरी राह पर कई आँधियाँ भी चलीं मगर कभी बादलों सा झुका नहीं मिरा आसमाँ मिरा आसमाँ
Aalok Shrivastav
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ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम जिन के परों पे सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम कुछ तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम गुज़रें हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो पर्दे हटाएँ देखें उन्हें खिड़कियों से हम जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम
Aalok Shrivastav
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वही आँगन वही खिड़की वही दर याद आता है अकेला जब भी होता हूँ मुझे घर याद आता है मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है तिरे अपनों को गाँव में तो अक्सर याद आता है जो अपने पास हों उन की कोई क़ीमत नहीं होती हमारे भाई को ही लो बिछड़ कर याद आता है सफलता के सफ़र में तो कहाँ फ़ुर्सत कि कुछ सोचें मगर जब चोट लगती है मुक़द्दर याद आता है मई और जून की गर्मी बदन से जब टपकती है नवम्बर याद आता है दिसम्बर याद आता है
Aalok Shrivastav
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