har ek baat ko chup-chap kyuun suna jaae kabhi to hausla kar ke nahin kaha jaae tumhara ghar bhi isi shahr ke hisar men hai lagi hai aag kahan kyuun pata kiya jaae juda hai hiir se ranjha kai zamanon se nae sire se kahani ko phir likha jaae kaha gaya hai sitaron ko chhuna mushkil hai ye kitna sach hai kabhi tajraba kiya jaae kitaben yuun to bahut si hain mere baare men kabhi akele men khud ko bhi padh liya jaae har ek baat ko chup-chap kyun suna jae kabhi to hausla kar ke nahin kaha jae tumhaara ghar bhi isi shahr ke hisar mein hai lagi hai aag kahan kyun pata kiya jae juda hai hir se ranjha kai zamanon se nae sire se kahani ko phir likha jae kaha gaya hai sitaron ko chhuna mushkil hai ye kitna sach hai kabhi tajraba kiya jae kitaben yun to bahut si hain mere bare mein kabhi akele mein khud ko bhi padh liya jae
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया जब तक था आसमान में सूरज सभी का था फिर यूँँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ आलम तमाम चंद मचानों में बट गया ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया
Nida Fazli
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चाहतें मौसमी परिंदे हैं रुत बदलते ही लौट जाते हैं घोंसले बन के टूट जाते हैं दाग़ शाख़ों पे चहचहाते हैं आने वाले बयाज़ में अपनी जाने वालों के नाम लिखते हैं सब ही औरों के ख़ाली कमरों को अपनी अपनी तरह सजाते हैं मौत इक वाहिमा है नज़रों का साथ छुटता कहाँ है अपनों का जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते चाँद तारों में जगमगाते हैं ये मुसव्विर अजीब होते हैं आप अपने हबीब होते हैं दूसरों की शबाहतें ले कर अपनी तस्वीर ही बनाते हैं यूँँ ही चलता है कारोबार-ए-जहाँ है ज़रूरी हर एक चीज़ यहाँ जिन दरख़्तों में फल नहीं आते वो जलाने के काम आते हैं
Nida Fazli
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जाने वालों से राब्ता रखना दोस्तो रस्म-ए-फ़ातिहा रखना घर की ता'मीर चाहे जैसी हो उस में रोने की कुछ जगह रखना मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिए अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना जिस्म में फैलने लगा है शहर अपनी तन्हाइयाँ बचा रखना मिलना-जुलना जहाँ ज़रूरी है मिलने-जुलने का हौसला रखना उम्र करने को है पचास को पार कौन है किस जगह पता रखना
Nida Fazli
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यूँँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है माने न माने कोई हक़ीक़त तो है यही चर्ख़ा है जिस के पास उसी की कपास है इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है
Nida Fazli
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इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहाँ भी ख़ूँ-ख़्वार दरिंदों के फ़क़त नाम अलग हैं हर शहर बयाबान यहाँ भी है वहाँ भी हिन्दू भी सुकूँ से है मुसलमाँ भी सुकूँ से इंसान परेशान यहाँ भी है वहाँ भी रहमान की रहमत हो कि भगवान की मूरत हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहाँ भी उठता है दिल-ओ-जाँ से धुआँ दोनों तरफ़ ही ये 'मीर' का दीवान यहाँ भी है वहाँ भी
Nida Fazli
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