ghazalKuch Alfaaz

हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं वर्ना दौड़ में सब से आगे हो सकता हूँ मैं कब समझेंगे जिन की ख़ातिर फूल बिछाता हूँ राह-गुज़र में काँटे भी तो बो सकता हूँ मैं इक छोटा सा बच्चा मुझ में अब तक ज़िंदा है छोटी छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं सन्नाटे में दहशत हर पल गूँजा करती है इस जंगल में चैन से कैसे सो सकता हूँ मैं सोच समझ कर चट्टानों से उलझा हूँ वर्ना बहती गंगा में हाथों को धो सकता हूँ मैं

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में आज़माएँ लोगों को ख़ूब आज़माने में दो-घड़ी के साथी को हम-सफ़र समझते हैं किस क़दर पुराने हैं हम नए ज़माने में तेरे पास आने में आधी उम्र गुज़री है आधी उम्र गुज़रेगी तुझ से ऊब जाने में एहतियात रखने की कोई हद भी होती है भेद हमीं ने खोले हैं भेद को छुपाने में ज़िंदगी तमाशा है और इस तमाशे में खेल हम बिगाड़ेंगे खेल को बनाने में

Alam Khursheed

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हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता जिसे पाया नहीं जाता उसे खोया नहीं जाता कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिन को सभी शादाब लगते हैं कुछ ऐसे दाग़ हैं जिन को कभी धोया नहीं जाता अजब सी गूँज उठती दर-ओ-दीवार से हर-दम ये ख़्वाबों का ख़राबा है यहाँ सोया नहीं जाता बहुत हँसने की आदत का यही अंजाम होता है कि हम रोना भी चाहें तो कभी रोया नहीं जाता

Alam Khursheed

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