हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़ यही रहा है अज़ल से क़लंदरों का तरीक़ हुजूम क्यूँँ है ज़ियादा शराब-ख़ाने में फ़क़त ये बात कि पीर-ए-मुग़ाँ है मर्द-ए-ख़लीक़ इलाज-ए-ज़ोफ़-ए-यक़ीं इन से हो नहीं सकता ग़रीब अगरचे हैं 'राज़ी' के नुक्ता-हाए-दक़ीक़ मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया ताइब ख़ुदा करे कि मिले शैख़ को भी ये तौफ़ीक़ उसी तिलिस्म-ए-कुहन में असीर है आदम बग़ल में उस की हैं अब तक बुतान-ए-अहद-ए-अतीक़ मिरे लिए तो है इक़रार-ए-बिल-लिसाँ भी बहुत हज़ार शुक्र कि मुल्ला हैं साहिब-ए-तसदीक़ अगर हो इश्क़ तो है कुफ़्र भी मुसलमानी न हो तो मर्द-ए-मुसलमाँ भी काफ़िर ओ ज़िंदीक़
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा
Tehzeeb Hafi
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उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या दाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या मेरी हर बात बे-असर ही रही नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं यही होता है ख़ानदान में क्या अपनी महरूमियाँ छुपाते हैं हम ग़रीबों की आन-बान में क्या ख़ुद को जाना जुदा ज़माने से आ गया था मिरे गुमान में क्या शाम ही से दुकान-ए-दीद है बंद नहीं नुक़सान तक दुकान में क्या ऐ मिरे सुब्ह-ओ-शाम-ए-दिल की शफ़क़ तू नहाती है अब भी बान में क्या बोलते क्यूँँ नहीं मिरे हक़ में आबले पड़ गए ज़बान में क्या ख़ामुशी कह रही है कान में क्या आ रहा है मिरे गुमान में क्या दिल कि आते हैं जिस को ध्यान बहुत ख़ुद भी आता है अपने ध्यान में क्या वो मिले तो ये पूछना है मुझे अब भी हूँ मैं तिरी अमान में क्या यूँँ जो तकता है आसमान को तू कोई रहता है आसमान में क्या है नसीम-ए-बहार गर्द-आलूद ख़ाक उड़ती है उस मकान में क्या ये मुझे चैन क्यूँँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
Jawwad Sheikh
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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे
Khalil Ur Rehman Qamar
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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं
Jawwad Sheikh
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ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं तिरा इलाज नज़र के सिवा कुछ और नहीं हर इक मक़ाम से आगे मक़ाम है तेरा हयात ज़ौक़-ए-सफ़र के सिवा कुछ और नहीं गिराँ-बहा है तो हिफ़्ज़-ए-ख़ुदी से है वर्ना गुहर में आब-ए-गुहर के सिवा कुछ और नहीं रगों में गर्दिश-ए-ख़ूँ है अगर तो क्या हासिल हयात सोज़-ए-जिगर के सिवा कुछ और नहीं उरूस-ए-लाला मुनासिब नहीं है मुझ से हिजाब कि मैं नसीम-ए-सहर के सिवा कुछ और नहीं जिसे कसाद समझते हैं ताजिरान-ए-फ़रंग वो शय मता-ए-हुनर के सिवा कुछ और नहीं बड़ा करीम है 'इक़बाल'-ए-बे-नवा लेकिन अता-ए-शोला शरर के सिवा कुछ और नहीं
Allama Iqbal
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हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही क्या चाँद तारे क्या मुर्ग़ ओ माही तू मर्द-ए-मैदाँ तू मीर-ए-लश्कर नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही कुछ क़द्र अपनी तू ने न जानी ये बे-सवादी ये कम-निगाही दुनिया-ए-दूँ की कब तक ग़ुलामी या राहेबी कर या पादशाही पीर-ए-हरम को देखा है मैं ने किरदार-ए-बे-सोज़ गुफ़्तार वाही
Allama Iqbal
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तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को कि मैं आप का सामना चाहता हूँ ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ
Allama Iqbal
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सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं ढूँढ़ता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
Allama Iqbal
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ए'जाज़ है किसी का या गर्दिश-ए-ज़माना टूटा है एशिया में सेहर-ए-फ़िरंगियाना तामीर-ए-आशियाँ से मैं ने ये राज़ पाया अह्ल-ए-नवा के हक़ में बिजली है आशियाना ये बंदगी ख़ुदाई वो बंदगी गदाई या बंदा-ए-ख़ुदा बन या बंदा-ए-ज़माना ग़ाफ़िल न हो ख़ुदी से कर अपनी पासबानी शायद किसी हरम का तू भी है आस्ताना ऐ ला इलाह के वारिस बाक़ी नहीं है तुझ में गुफ़्तार-ए-दिलबराना किरदार-ए-क़ाहिराना तेरी निगाह से दिल सीनों में काँपते थे खोया गया है तेरा जज़्ब-ए-क़लंदराना राज़-ए-हरम से शायद 'इक़बाल' बा-ख़बर है हैं इस की गुफ़्तुगू के अंदाज़ महरमाना
Allama Iqbal
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