ghazalKuch Alfaaz

हज़ार सहरा थे रस्ते में यार क्या करता जो चल पड़ा था तो फ़िक्र-ए-ग़ुबार क्या करता कभी जो ठीक से ख़ुद को समझ नहीं पाया वो दूसरों पे भला ए'तिबार क्या करता चलो ये माना कि इज़हार भी ज़रूरी है सो एक बार किया, बार बार क्या करता इसी लिए तो दर-ए-आइना भी वा न किया जो सो रहे हैं उन्हें होशियार क्या करता वो अपने ख़्वाब की तफ़्सीर ख़ुद न कर पाया जहान भर पे उसे आश्कार क्या करता अगर वो करने पे आता तो कुछ भी कर जाता ये सोच मत कि अकेला शरार क्या करता सिवाए ये कि वो अपने भी ज़ख़्म ताज़ा करे मिरे ग़मों पे मिरा ग़म-गुसार क्या करता बस एक फूल की ख़ातिर बहार माँगी थी रुतों से वर्ना मैं क़ौल-ओ-क़रार क्या करता मिरा लहू ही कहानी का रंग था 'जव्वाद' कहानी-कार उसे रंग-दार क्या करता

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा

Jawwad Sheikh

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नहीं ऐसा भी कि यकसर नहीं रहने वाला दिल में ये शोर बराबर नहीं रहने वाला जिस तरह ख़ामुशी लफ़्ज़ों में ढली जाती है इस में तासीर का उंसुर नहीं रहने वाला अब ये किस शक्ल में ज़ाहिर हो, ख़ुदा ही जाने रंज ऐसा है कि अंदर नहीं रहने वाला मैं उसे छोड़ना चाहूँ भी तो कैसे छोड़ूँ? वो किसी और का हो कर नहीं रहने वाला ग़ौर से देख उन आँखों में नज़र आता है वो समुंदर जो समुंदर नहीं रहने वाला जुर्म वो करने का सोचा है कि बस अब की बार कोई इल्ज़ाम मिरे सर नहीं रहने वाला मैं ने हालाँकि बहुत वक़्त गुज़ारा है यहाँ अब मैं इस शहर में पल भर नहीं रहने वाला मस्लहत लफ़्ज़ पे दो हर्फ़ न भेजूँ? 'जव्वाद' जब मिरे साथ मुक़द्दर नहीं रहने वाला

Jawwad Sheikh

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उस ने कोई तो दम पढ़ा हुआ है जिस ने देखा वो मुब्तला हुआ है अब तिरे रास्ते से बच निकलूँ इक यही रास्ता बचा हुआ है आओ तक़रीब-ए-रू-नुमाई करें पाँव में एक आबला हुआ है फिर वही बहस छेड़ देते हो इतनी मुश्किल से राब्ता हुआ है रात की वारदात मत पूछो वाक़ई एक वाक़िआ' हुआ है लग रहा है ये नर्म लहजे से फिर तुझे कोई मसअला हुआ है मैं कहाँ और वो फ़सील कहाँ फ़ासले का ही फ़ैसला हुआ है इतना मसरूफ़ हो गया हूँ कि बस 'मीर' भी इक तरफ़ पड़ा हुआ है आज कुछ भी नहीं हुआ 'जव्वाद' हाँ मगर एक सानेहा हुआ है

Jawwad Sheikh

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दाद तो बा'द में कमाएँगे पहले हम सोचना सिखाएँगे मैं कहीं जा नहीं रहा लेकिन आप क्या मेरे साथ आएँगे कोई खिड़की खुलेगी रात गए कई अपनी मुराद पाएँगे खुल के रोने पे इख़्तियार नहीं हम कोई जश्न क्या मनाएँगे हँसेंगे तेरी बद-हवा सेी पर लोग रस्ता नहीं बताएँगे तुम उठाओगे कोई रंज मिरा दोस्त अहबाब हज़ उठाएँगे हमें अपनी तलाश में मत भेज खड़ी फ़सलें उजाड़ आएँगे

Jawwad Sheikh

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मिरे हवा से पे हावी रही कोई कोई बात कि ज़िंदगी से सिवा ख़ास थी कोई कोई बात ये और बात कि महसूस तक न होने दूँ जकड़ सी लेती है दिल को तिरी कोई कोई बात कोई भी तुझ सा मुझे हू-ब-हू कहीं न मिला किसी किसी में अगरचे मिली कोई कोई बात ख़ुशी हुई कि मुलाक़ात राएगाँ न गई उसे भी मेरी तरह याद थी कोई कोई बात बदन में ज़हर के मानिंद फैल जाती है दिलों में ख़ौफ़ से सहमी हुई कोई कोई बात कभी समझ नहीं पाए कि उस में क्या है मगर चली तो ऐसे कि बस चल पड़ी कोई कोई बात वज़ाहतों में उलझ कर यही खिला 'जव्वाद' ज़रूरी है कि रहे अन-कही कोई कोई बात

Jawwad Sheikh

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