ghazalKuch Alfaaz

हिज्र हूँ पूरा हिज्र हूँ इश्क़ विसाल करे दिल की धड़कन ताल हो जिस्म धमाल करे देखूँ उस की चाँदनी चाँद से भी शफ़्फ़ाफ़ और सुनहरी रौशनी अपना जमाल करे गंदुम जैसे रंग पर काली चादर तान गीतों जैसी ज़िंदगी बे-सुर-ताल करे मंज़र से जो दूर हैं उन पर करे निगाह ध्यान से पहले देखना वही कमाल करे उस का इक पल देखना, उस पर दरूद सलाम हिज्र भरी जो ज़िंदगी ऐन विसाल करे अपना मुझ को रूप दे, अपना आशिक़ हो जो भी उस का हाल है मेरा हाल करे सारे सवाल आसान हैं मुश्किल एक जवाब हम भी एक जवाब हैं कोई सवाल करे

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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कोई फूल मुझ में खिला दिया तेरे इश्क़ ने मुझे रंग-साज़ बना दिया तेरे इश्क़ ने उन्हें पाँच वक़्तों के चंद सज्दों से क्या गरज़ जिन्हें पूरा-पूरा झुका दिया तेरे इश्क़ ने मैं वो ख़ाक हूँ कि जो धूल है तेरे पाऊँ की मैं वो आब जिस को जला दिया तेरे इश्क़ ने

Nadeem Bhabha

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हमारे हाफ़िज़े बे-कार हो गए साहिब जवाब और भी दुश्वार हो गए साहिब उसे भी शौक़ था तस्वीर में उतरने का तो हम भी शौक़ से दीवार हो गए साहिब तिरे लिबास के रंगों में खो गई फ़ितरत ये फूल-शूल तो बे-कार हो गए साहिब गले लगा के उसे ख़्वाब में बहुत रोए और इतना रोए कि बेदार हो गए साहिब हमारी रूह परिंदों को सौंप दी जाए कि ये बदन तो गुनहगार हो गए साहिब नज़र मिलाई तो इक आग ने लपेट लिया बदन जलाए तो गुलज़ार हो गए साहिब चराग़ दफ़्न किए थे 'नदीम' क़ब्रों में ज़मीं से चाँद नुमूदार हो गए साहिब

Nadeem Bhabha

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मैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ तख़्त के बा'द तिरे पाँव में देखा गया हूँ दफ़्न होती हुई झीलों में ठिकाने हैं मिरे ख़ुश्क होते हुए दरियाओं में देखा गया हूँ मस्जिदों और मज़ारों में मिरे चर्चे हैं मंदिरों और कलीसाओं में देखा गया हूँ लम्हा भर को मिरे सर पर कोई बादल आया कहने वालों ने कहा छाँव में देखा गया हूँ फिर मुझे ख़ुद भी ख़बर हो न सकी मैं हूँ कहाँ आख़िरी बार तिरे गाँव में देखा गया हूँ वस्ल के तीन सौ तेरह में कहीं हूँ मौजूद हिज्र के मारका-आराओं में देखा गया हूँ

Nadeem Bhabha

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तमाम उम्र जले और रौशनी नहीं की ये ज़िंदगी है तो फिर हम ने ज़िंदगी नहीं की सितम तो ये है कि मेरे ख़िलाफ़ बोलते हैं वो लोग जिन से कभी मैं ने बात भी नहीं की जो दिल में आता गया सिद्क़-ए-दिल से लिखता गया दुआएँ माँगी हैं मैं ने तो शाएरी नहीं की बस इतना है कि मिरा बख़्त ढल गया और फिर मिरे चराग़ ने भी मुझ पे रौशनी नहीं की मिरी सिपाह से दुनिया लरज़ने लगती है मगर तुम्हारी तो मैं ने बराबरी नहीं की कुछ इस लिए भी अकेला सा हो गया हूँ 'नदीम' सभी को दोस्त बनाया है दुश्मनी नहीं की

Nadeem Bhabha

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वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं हम सितारे हैं मगर रात से निकले हुए हैं ख़ामुशी हम पे गिरी आख़िरी मिट्टी की तरह ऐसे चुप हैं कि हर इक बात से निकले हुए हैं हम किसी ज़ोम में नाराज़ हुए हैं तुझ से हम किसी बात पे औक़ात से निकले हुए हैं ये मिरा ग़म है मिरे दोस्त मगर तू ये समझ अश्क तो शिद्दत-ए-जज़्बात से निकले हुए हैं हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं हम तिरी जीत तिरी मात से निकले हुए हैं

Nadeem Bhabha

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