तमाम उम्र जले और रौशनी नहीं की ये ज़िंदगी है तो फिर हम ने ज़िंदगी नहीं की सितम तो ये है कि मेरे ख़िलाफ़ बोलते हैं वो लोग जिन से कभी मैं ने बात भी नहीं की जो दिल में आता गया सिद्क़-ए-दिल से लिखता गया दुआएँ माँगी हैं मैं ने तो शाएरी नहीं की बस इतना है कि मिरा बख़्त ढल गया और फिर मिरे चराग़ ने भी मुझ पे रौशनी नहीं की मिरी सिपाह से दुनिया लरज़ने लगती है मगर तुम्हारी तो मैं ने बराबरी नहीं की कुछ इस लिए भी अकेला सा हो गया हूँ 'नदीम' सभी को दोस्त बनाया है दुश्मनी नहीं की
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो
Tehzeeb Hafi
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हिज्र हूँ पूरा हिज्र हूँ इश्क़ विसाल करे दिल की धड़कन ताल हो जिस्म धमाल करे देखूँ उस की चाँदनी चाँद से भी शफ़्फ़ाफ़ और सुनहरी रौशनी अपना जमाल करे गंदुम जैसे रंग पर काली चादर तान गीतों जैसी ज़िंदगी बे-सुर-ताल करे मंज़र से जो दूर हैं उन पर करे निगाह ध्यान से पहले देखना वही कमाल करे उस का इक पल देखना, उस पर दरूद सलाम हिज्र भरी जो ज़िंदगी ऐन विसाल करे अपना मुझ को रूप दे, अपना आशिक़ हो जो भी उस का हाल है मेरा हाल करे सारे सवाल आसान हैं मुश्किल एक जवाब हम भी एक जवाब हैं कोई सवाल करे
Nadeem Bhabha
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मैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ तख़्त के बा'द तिरे पाँव में देखा गया हूँ दफ़्न होती हुई झीलों में ठिकाने हैं मिरे ख़ुश्क होते हुए दरियाओं में देखा गया हूँ मस्जिदों और मज़ारों में मिरे चर्चे हैं मंदिरों और कलीसाओं में देखा गया हूँ लम्हा भर को मिरे सर पर कोई बादल आया कहने वालों ने कहा छाँव में देखा गया हूँ फिर मुझे ख़ुद भी ख़बर हो न सकी मैं हूँ कहाँ आख़िरी बार तिरे गाँव में देखा गया हूँ वस्ल के तीन सौ तेरह में कहीं हूँ मौजूद हिज्र के मारका-आराओं में देखा गया हूँ
Nadeem Bhabha
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कोई फूल मुझ में खिला दिया तेरे इश्क़ ने मुझे रंग-साज़ बना दिया तेरे इश्क़ ने उन्हें पाँच वक़्तों के चंद सज्दों से क्या गरज़ जिन्हें पूरा-पूरा झुका दिया तेरे इश्क़ ने मैं वो ख़ाक हूँ कि जो धूल है तेरे पाऊँ की मैं वो आब जिस को जला दिया तेरे इश्क़ ने
Nadeem Bhabha
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वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं हम सितारे हैं मगर रात से निकले हुए हैं ख़ामुशी हम पे गिरी आख़िरी मिट्टी की तरह ऐसे चुप हैं कि हर इक बात से निकले हुए हैं हम किसी ज़ोम में नाराज़ हुए हैं तुझ से हम किसी बात पे औक़ात से निकले हुए हैं ये मिरा ग़म है मिरे दोस्त मगर तू ये समझ अश्क तो शिद्दत-ए-जज़्बात से निकले हुए हैं हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं हम तिरी जीत तिरी मात से निकले हुए हैं
Nadeem Bhabha
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जैसा हूँ जिस हाल में हूँ अच्छा हूँ मैं तुम ने ज़िंदा समझा तो ज़िंदा हूँ मैं इक आवाज़ के आते ही मर जाऊँगा इक आवाज़ के सुनने को ज़िंदा हूँ मैं खुले हुए दरवाज़े दस्तक भूल चुके इन्दर आ जाओ पहचान चुका हूँ मैं और कोई पहचान मिरी बनती ही नहीं जानते हैं सब लोग कि बस तेरा हूँ मैं जाने किस को राज़ी करना है मुझ को जाने किस की ख़ातिर नाच रहा हूँ मैं अब तो ये भी याद नहीं कि मोहब्बत में कब से तेरे पास हूँ और कितना हूँ मैं
Nadeem Bhabha
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