ghazalKuch Alfaaz

कोई फूल मुझ में खिला दिया तेरे इश्क़ ने मुझे रंग-साज़ बना दिया तेरे इश्क़ ने उन्हें पाँच वक़्तों के चंद सज्दों से क्या गरज़ जिन्हें पूरा-पूरा झुका दिया तेरे इश्क़ ने मैं वो ख़ाक हूँ कि जो धूल है तेरे पाऊँ की मैं वो आब जिस को जला दिया तेरे इश्क़ ने

Related Ghazal

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

249 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

190 likes

More from Nadeem Bhabha

हिज्र हूँ पूरा हिज्र हूँ इश्क़ विसाल करे दिल की धड़कन ताल हो जिस्म धमाल करे देखूँ उस की चाँदनी चाँद से भी शफ़्फ़ाफ़ और सुनहरी रौशनी अपना जमाल करे गंदुम जैसे रंग पर काली चादर तान गीतों जैसी ज़िंदगी बे-सुर-ताल करे मंज़र से जो दूर हैं उन पर करे निगाह ध्यान से पहले देखना वही कमाल करे उस का इक पल देखना, उस पर दरूद सलाम हिज्र भरी जो ज़िंदगी ऐन विसाल करे अपना मुझ को रूप दे, अपना आशिक़ हो जो भी उस का हाल है मेरा हाल करे सारे सवाल आसान हैं मुश्किल एक जवाब हम भी एक जवाब हैं कोई सवाल करे

Nadeem Bhabha

1 likes

मैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ तख़्त के बा'द तिरे पाँव में देखा गया हूँ दफ़्न होती हुई झीलों में ठिकाने हैं मिरे ख़ुश्क होते हुए दरियाओं में देखा गया हूँ मस्जिदों और मज़ारों में मिरे चर्चे हैं मंदिरों और कलीसाओं में देखा गया हूँ लम्हा भर को मिरे सर पर कोई बादल आया कहने वालों ने कहा छाँव में देखा गया हूँ फिर मुझे ख़ुद भी ख़बर हो न सकी मैं हूँ कहाँ आख़िरी बार तिरे गाँव में देखा गया हूँ वस्ल के तीन सौ तेरह में कहीं हूँ मौजूद हिज्र के मारका-आराओं में देखा गया हूँ

Nadeem Bhabha

2 likes

वक़्त की तरह तिरे हाथ से निकले हुए हैं हम सितारे हैं मगर रात से निकले हुए हैं ख़ामुशी हम पे गिरी आख़िरी मिट्टी की तरह ऐसे चुप हैं कि हर इक बात से निकले हुए हैं हम किसी ज़ोम में नाराज़ हुए हैं तुझ से हम किसी बात पे औक़ात से निकले हुए हैं ये मिरा ग़म है मिरे दोस्त मगर तू ये समझ अश्क तो शिद्दत-ए-जज़्बात से निकले हुए हैं हम ग़ुलामी को मुक़द्दर की तरह जानते हैं हम तिरी जीत तिरी मात से निकले हुए हैं

Nadeem Bhabha

1 likes

जैसा हूँ जिस हाल में हूँ अच्छा हूँ मैं तुम ने ज़िंदा समझा तो ज़िंदा हूँ मैं इक आवाज़ के आते ही मर जाऊँगा इक आवाज़ के सुनने को ज़िंदा हूँ मैं खुले हुए दरवाज़े दस्तक भूल चुके इन्दर आ जाओ पहचान चुका हूँ मैं और कोई पहचान मिरी बनती ही नहीं जानते हैं सब लोग कि बस तेरा हूँ मैं जाने किस को राज़ी करना है मुझ को जाने किस की ख़ातिर नाच रहा हूँ मैं अब तो ये भी याद नहीं कि मोहब्बत में कब से तेरे पास हूँ और कितना हूँ मैं

Nadeem Bhabha

4 likes

तमाम उम्र जले और रौशनी नहीं की ये ज़िंदगी है तो फिर हम ने ज़िंदगी नहीं की सितम तो ये है कि मेरे ख़िलाफ़ बोलते हैं वो लोग जिन से कभी मैं ने बात भी नहीं की जो दिल में आता गया सिद्क़-ए-दिल से लिखता गया दुआएँ माँगी हैं मैं ने तो शाएरी नहीं की बस इतना है कि मिरा बख़्त ढल गया और फिर मिरे चराग़ ने भी मुझ पे रौशनी नहीं की मिरी सिपाह से दुनिया लरज़ने लगती है मगर तुम्हारी तो मैं ने बराबरी नहीं की कुछ इस लिए भी अकेला सा हो गया हूँ 'नदीम' सभी को दोस्त बनाया है दुश्मनी नहीं की

Nadeem Bhabha

4 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Nadeem Bhabha.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Nadeem Bhabha's ghazal.