हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए इश्क़ के मग़्फ़िरत की दुआ कीजिए इस सलीक़े से उन से गिला कीजिए जब गिला कीजिए हँस दिया कीजिए दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए सामने आइना रख लिया कीजिए आप सुख से हैं तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ के बा'द इतनी जल्दी न ये फ़ैसला कीजिए ज़िंदगी कट रही है बड़े चैन से और ग़म हों तो वो भी अता कीजिए कोई धोका न खा जाए मेरी तरह ऐसे खुल के न सब से मिला कीजिए अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार' अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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वो सिवा याद आए भुलाने के बा'द ज़िंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बा'द दिल सुलगता रहा आशियाने के बा'द आग ठंडी हुई इक ज़माने के बा'द रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा ऐसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बा'द जब न कुछ बन पड़ा अर्ज़-ए-ग़म का जवाब वो ख़फ़ा हो गए मुस्कुराने के बा'द दुश्मनों से पशेमान होना पड़ा दोस्तों का ख़ुलूस आज़माने के बा'द रंज हद से गुज़र के ख़ुशी बन गया हो गए पार हम डूब जाने के बा'द बख़्श दे या रब अहल-ए-हवस को बहिश्त मुझ को क्या चाहिए तुझ को पाने के बा'द कैसे कैसे गिले याद आए 'ख़ुमार' उन के आने से क़ब्ल उन के जाने के बा'द
Khumar Barabankvi
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क्या हुआ हुस्न है हम-सफ़र या नहीं इश्क़ मंज़िल ही मंज़िल है रस्ता नहीं दो परिंदे उड़े आँख नम हो गई आज समझा कि मैं तुझ को भूला नहीं तर्क-ए-मय को अभी दिन ही कितने हुए कुछ कहा मय को ज़ाहिद तो अच्छा न हर नज़र मेरी बन जाती ज़ंजीर-ए-पा उस ने जाते हुए मुड़ के देखा नहीं छोड़ भी दे मिरा साथ ऐ ज़िंदगी मुझ को तुझ से नदामत है शिकवा नहीं तू ने तौबा तो कर ली मगर ऐ 'ख़ुमार' तुझ को रहमत पे शायद भरोसा नहीं
Khumar Barabankvi
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अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से ये क्यूँँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं बहुत ख़ुश हैं गुस्ताख़ियों पर हमारी ब-ज़ाहिर जो बरहम नज़र आ रहे हैं ये कैसी हवा-ए-तरक़्क़ी चली है दीए तो दीए दिल बुझे जा रहे हैं बहिश्त-ए-तसव्वुर के जलवे हैं मैं हूँ जुदाई सलामत मज़े आ रहे हैं बहारों में भी मय से परहेज़ तौबा ‘ख़ुमार’ आप काफ़िर हुए जा रहे हैं
Khumar Barabankvi
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तू चाहिए न तेरी वफ़ा चाहिए मुझे कुछ भी न तेरे ग़म के सिवा चाहिए मुझे मरने से पहले शक्ल ही इक बार देख लूँ ऐ मौत ज़िंदगी का पता चाहिए मुझे या रब मुआ'फ़ कर के न दे कर्ब-ए-इंफ़ि'आल मैं ने ख़ताएँ की हैं सज़ा चाहिए मुझे ख़ामोशी-ए-हयात से उकता गया हूँ मैं अब चाहे दिल ही टूटे सदा चाहिए मुझे उन मस्त मस्त आँखों में आँसू अरे ग़ज़ब ये इश्क़ है तो क़हर-ए-ख़ुदा चाहिए मुझे नासेह नसीहतों का ज़माना गुज़र गया अब प्यारे सिर्फ़ तेरी दुआ चाहिए मुझे हर दर्द को दवा की ज़रूरत है ऐ 'ख़ुमार' जो दर्द ख़ुद हो अपनी दवा चाहिए मुझे
Khumar Barabankvi
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हम उन्हें वो हमें भुला बैठे दो गुनहगार ज़हर खा बैठे हाल-ए-ग़म कह के ग़म बढ़ा बैठे तीर मारे थे तीर खा बैठे आँधियो जाओ अब करो आराम हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे जी तो हल्का हुआ मगर यारो रो के हम लुत्फ़-ए-ग़म गँवा बैठे बे-सहारों का हौसला ही क्या घर में घबराए दर पे आ बैठे जब से बिछड़े वो मुस्कुराए न हम सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे हम रहे मुब्तला-ए-दैर-ओ-हरम वो दबे पाँव दिल में आ बैठे उठ के इक बे-वफ़ा ने दे दी जान रह गए सारे बा-वफ़ा बैठे हश्र का दिन अभी है दूर 'ख़ुमार' आप क्यूँँ ज़ाहिदों में जा बैठे
Khumar Barabankvi
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