इलाही मिरे दोस्त हों ख़ैरियत से ये क्यूँँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं
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Khumar Barabankvi
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए सामने आइना रख लिया कीजिए
sherKuch Alfaaz
हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए इश्क़ के मग़्फ़िरत की दुआ कीजिए
sherKuch Alfaaz
फूल कर ले निबाह काँटों से आदमी ही न आदमी से मिले
sherKuch Alfaaz
हटाए थे जो राह से दोस्तों की वो पत्थर मेरे घर में आने लगे हैं
sherKuch Alfaaz
रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे कट गई उम्र रात बाक़ी है
sherKuch Alfaaz
ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही
sherKuch Alfaaz
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
sherKuch Alfaaz
तेरे दर से जब उठ के जाना पड़ेगा ख़ुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा
sherKuch Alfaaz
हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तो सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं
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