वो सिवा याद आए भुलाने के बा'द ज़िंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बा'द दिल सुलगता रहा आशियाने के बा'द आग ठंडी हुई इक ज़माने के बा'द रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा ऐसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बा'द जब न कुछ बन पड़ा अर्ज़-ए-ग़म का जवाब वो ख़फ़ा हो गए मुस्कुराने के बा'द दुश्मनों से पशेमान होना पड़ा दोस्तों का ख़ुलूस आज़माने के बा'द रंज हद से गुज़र के ख़ुशी बन गया हो गए पार हम डूब जाने के बा'द बख़्श दे या रब अहल-ए-हवस को बहिश्त मुझ को क्या चाहिए तुझ को पाने के बा'द कैसे कैसे गिले याद आए 'ख़ुमार' उन के आने से क़ब्ल उन के जाने के बा'द
Related Ghazal
तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
249 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
मेरे लिए तो इश्क़ का वा'दा है शा'इरी आधा सुरूर तुम हो तो आधा है शा'इरी रुद्राक्ष हाथ में है तो सीने में ओम है कृष्णा है मेरा दिल मेरी राधा है शा'इरी अपना तो मेल जोल ही बस आशिकों से है दरवेश का बस एक लबादा है शा'इरी हो आश्ना कोई तो दिखाती है अपना रंग बे रम्ज़ियों के वास्ते सादा है शा'इरी तुम सामने हो और मेरी दस्तरस में हो इस वक़्त मेरे दिल का इरादा है शा'इरी भगवान हो ख़ुदा हो मुहब्बत हो या बदन जिस सम्त भी चलो यही जादा है शा'इरी इस लिए भी इश्क़ ही लिखता हूँ मैं अली मेरा किसी से आख़री वा'दा है शा'इरी
Ali Zaryoun
70 likes
अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
66 likes
More from Khumar Barabankvi
क्या हुआ हुस्न है हम-सफ़र या नहीं इश्क़ मंज़िल ही मंज़िल है रस्ता नहीं दो परिंदे उड़े आँख नम हो गई आज समझा कि मैं तुझ को भूला नहीं तर्क-ए-मय को अभी दिन ही कितने हुए कुछ कहा मय को ज़ाहिद तो अच्छा न हर नज़र मेरी बन जाती ज़ंजीर-ए-पा उस ने जाते हुए मुड़ के देखा नहीं छोड़ भी दे मिरा साथ ऐ ज़िंदगी मुझ को तुझ से नदामत है शिकवा नहीं तू ने तौबा तो कर ली मगर ऐ 'ख़ुमार' तुझ को रहमत पे शायद भरोसा नहीं
Khumar Barabankvi
6 likes
हम उन्हें वो हमें भुला बैठे दो गुनहगार ज़हर खा बैठे हाल-ए-ग़म कह के ग़म बढ़ा बैठे तीर मारे थे तीर खा बैठे आँधियो जाओ अब करो आराम हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे जी तो हल्का हुआ मगर यारो रो के हम लुत्फ़-ए-ग़म गँवा बैठे बे-सहारों का हौसला ही क्या घर में घबराए दर पे आ बैठे जब से बिछड़े वो मुस्कुराए न हम सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे हम रहे मुब्तला-ए-दैर-ओ-हरम वो दबे पाँव दिल में आ बैठे उठ के इक बे-वफ़ा ने दे दी जान रह गए सारे बा-वफ़ा बैठे हश्र का दिन अभी है दूर 'ख़ुमार' आप क्यूँँ ज़ाहिदों में जा बैठे
Khumar Barabankvi
8 likes
हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए इश्क़ के मग़्फ़िरत की दुआ कीजिए इस सलीक़े से उन से गिला कीजिए जब गिला कीजिए हँस दिया कीजिए दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए सामने आइना रख लिया कीजिए आप सुख से हैं तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ के बा'द इतनी जल्दी न ये फ़ैसला कीजिए ज़िंदगी कट रही है बड़े चैन से और ग़म हों तो वो भी अता कीजिए कोई धोका न खा जाए मेरी तरह ऐसे खुल के न सब से मिला कीजिए अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार' अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए
Khumar Barabankvi
1 likes
तू चाहिए न तेरी वफ़ा चाहिए मुझे कुछ भी न तेरे ग़म के सिवा चाहिए मुझे मरने से पहले शक्ल ही इक बार देख लूँ ऐ मौत ज़िंदगी का पता चाहिए मुझे या रब मुआ'फ़ कर के न दे कर्ब-ए-इंफ़ि'आल मैं ने ख़ताएँ की हैं सज़ा चाहिए मुझे ख़ामोशी-ए-हयात से उकता गया हूँ मैं अब चाहे दिल ही टूटे सदा चाहिए मुझे उन मस्त मस्त आँखों में आँसू अरे ग़ज़ब ये इश्क़ है तो क़हर-ए-ख़ुदा चाहिए मुझे नासेह नसीहतों का ज़माना गुज़र गया अब प्यारे सिर्फ़ तेरी दुआ चाहिए मुझे हर दर्द को दवा की ज़रूरत है ऐ 'ख़ुमार' जो दर्द ख़ुद हो अपनी दवा चाहिए मुझे
Khumar Barabankvi
2 likes
अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं इलाही मेरे दोस्त हों ख़ैरियत से ये क्यूँँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं बहुत ख़ुश हैं गुस्ताख़ियों पर हमारी ब-ज़ाहिर जो बरहम नज़र आ रहे हैं ये कैसी हवा-ए-तरक़्क़ी चली है दीए तो दीए दिल बुझे जा रहे हैं बहिश्त-ए-तसव्वुर के जलवे हैं मैं हूँ जुदाई सलामत मज़े आ रहे हैं बहारों में भी मय से परहेज़ तौबा ‘ख़ुमार’ आप काफ़िर हुए जा रहे हैं
Khumar Barabankvi
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Khumar Barabankvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Khumar Barabankvi's ghazal.







