इश्क़ ने जब भी किसी दिल पे हुकूमत की है तो उसे दर्द की मे'राज इनायत की है अपनी ताईद पे ख़ुद अक़्ल भी हैरान हुई दिल ने ऐसे मिरे ख़्वाबों की हिमायत की है शहर-ए-एहसास तिरी याद से रौशन कर के मैं ने हर घर में तिरे ज़िक्र की जुरअत की है मुझ को लगता है कि इंसान अधूरा है अभी तू ने दुनिया में उसे भेज के उजलत की है शहर के तीरा-तरीं घर से वो ख़ुर्शीद मिला जिस की तनवीर में तासीर क़यामत की है सोचता हूँ कि मैं ऐसे में किधर को जाऊँ तेरा मिलना भी कठिन, याद भी शिद्दत की है इस तरह औंधे पड़े हैं ये शिकस्ता जज़्बे जैसे इक वहम ने इन सब की इमामत की है ये जो बिखरी हुई लाशें हैं वरक़ पर 'जव्वाद' ये मिरे ज़ब्त से लफ़्ज़ों ने बग़ावत की है
Related Ghazal
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
130 likes
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
107 likes
ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
292 likes
मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
73 likes
बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है
Mehshar Afridi
73 likes
More from Jawwad Sheikh
उस ने कोई तो दम पढ़ा हुआ है जिस ने देखा वो मुब्तला हुआ है अब तिरे रास्ते से बच निकलूँ इक यही रास्ता बचा हुआ है आओ तक़रीब-ए-रू-नुमाई करें पाँव में एक आबला हुआ है फिर वही बहस छेड़ देते हो इतनी मुश्किल से राब्ता हुआ है रात की वारदात मत पूछो वाक़ई एक वाक़िआ' हुआ है लग रहा है ये नर्म लहजे से फिर तुझे कोई मसअला हुआ है मैं कहाँ और वो फ़सील कहाँ फ़ासले का ही फ़ैसला हुआ है इतना मसरूफ़ हो गया हूँ कि बस 'मीर' भी इक तरफ़ पड़ा हुआ है आज कुछ भी नहीं हुआ 'जव्वाद' हाँ मगर एक सानेहा हुआ है
Jawwad Sheikh
7 likes
मेरा ख़ज़ाना ज़माने के हाथ जा न लगे तुझे किसी की किसी को तेरी हवा न लगे मैं एक जिस्म को चखना तो चाहता हूँ मगर कुछ इस तरह कि मेरे मुँह को ज़ाएका न लगे हमें लगा सो लगा ख़ुद-अज़िय्यती का नशा दुआ करो कि तुम्हें बद-दुआ दुआ न लगे दुआ करो कि किसी का न दिल लगे तुम सेे लगे तो और किसी से लगा हुआ न लगे हसद किया हो तेरे रिज़्क़ से कभी मैं ने तो मुझ को अपनी कमाई हुई ग़िज़ा न लगे हमें ही इश्क़ की तशहीर चाहिए वरना पता न लगने दिया जाए तो पता न लगे पड़ा रहा मैं किसी और ही बखेड़े में बहुत से क़ीमती जज़्बे किसी दिशा न लगे बना रहा हूँ तसव्वुर में एक मुद्दत से एक ऐसा शहर जिसे कोई रास्ता न लगे हमें तो उस सेे मुहब्बत है और बेहद है अगर उसे नहीं लगता तो क्या हुआ न लगे किसे ख़ुशी नहीं होती सराहे जाने की मगर वो दोस्त ही क्या है जो आइना न लगे कभी कभार जो रखने लगे ज़बाँ का भरम वो अब भी क्या नहीं लगता मजीद क्या न लगे यही कहूँगा कि 'जव्वाद' बच बचा के ज़रा अगर किसी का रवैया बरादरा न लगे
Jawwad Sheikh
21 likes
जो भी जीने के सिलसिले किए थे हम ने बस आप के लिए किए थे तब कहीं जा के अपनी मर्ज़ी की पहले अपनों से मशवरे किए थे कभी उस की निगह मुयस्सर थी कैसे कैसे मुशाहिदे किए थे अक़्ल कुछ और कर के बैठ रही इश्क़ ने और फ़ैसले किए थे बात हम ने सुनी हुई सुनी थी काम उस ने किए हुए किए थे उसे भी एक ख़त लिखा गया था अपने आगे भी आइने किए थे यहाँ कुछ भी नहीं है मेरे लिए तू ने क्या क्या मुबालग़े किए थे अव्वल आने का शौक़ था लेकिन काम सारे ही दूसरे किए थे बड़ी मुश्किल थी वो घड़ी 'जव्वाद' हम ने कब ऐसे फ़ैसले किए थे
Jawwad Sheikh
14 likes
मिरे हवा से पे हावी रही कोई कोई बात कि ज़िंदगी से सिवा ख़ास थी कोई कोई बात ये और बात कि महसूस तक न होने दूँ जकड़ सी लेती है दिल को तिरी कोई कोई बात कोई भी तुझ सा मुझे हू-ब-हू कहीं न मिला किसी किसी में अगरचे मिली कोई कोई बात ख़ुशी हुई कि मुलाक़ात राएगाँ न गई उसे भी मेरी तरह याद थी कोई कोई बात बदन में ज़हर के मानिंद फैल जाती है दिलों में ख़ौफ़ से सहमी हुई कोई कोई बात कभी समझ नहीं पाए कि उस में क्या है मगर चली तो ऐसे कि बस चल पड़ी कोई कोई बात वज़ाहतों में उलझ कर यही खिला 'जव्वाद' ज़रूरी है कि रहे अन-कही कोई कोई बात
Jawwad Sheikh
23 likes
ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा
Jawwad Sheikh
9 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Jawwad Sheikh.
Similar Moods
More moods that pair well with Jawwad Sheikh's ghazal.







