जो भी जीने के सिलसिले किए थे हम ने बस आप के लिए किए थे तब कहीं जा के अपनी मर्ज़ी की पहले अपनों से मशवरे किए थे कभी उस की निगह मुयस्सर थी कैसे कैसे मुशाहिदे किए थे अक़्ल कुछ और कर के बैठ रही इश्क़ ने और फ़ैसले किए थे बात हम ने सुनी हुई सुनी थी काम उस ने किए हुए किए थे उसे भी एक ख़त लिखा गया था अपने आगे भी आइने किए थे यहाँ कुछ भी नहीं है मेरे लिए तू ने क्या क्या मुबालग़े किए थे अव्वल आने का शौक़ था लेकिन काम सारे ही दूसरे किए थे बड़ी मुश्किल थी वो घड़ी 'जव्वाद' हम ने कब ऐसे फ़ैसले किए थे
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
Jaun Elia
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा
Jawwad Sheikh
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सब को बचाओ ख़ुद भी बचो फ़ासला रखो अब और कुछ करो न करो फ़ासला रखो ख़तरा तो मुफ़्त में भी नहीं लेना चाहिए घर से निकल के मोल न लो फ़ासला रखो फ़िलहाल इस से बचने का है एक रास्ता वो ये कि इस से बच के रहो फ़ासला रखो दुश्मन है और तरह का जंग और तरह की आगे बढ़ो न पीछे हटो फ़ासला रखो
Jawwad Sheikh
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उस ने कोई तो दम पढ़ा हुआ है जिस ने देखा वो मुब्तला हुआ है अब तिरे रास्ते से बच निकलूँ इक यही रास्ता बचा हुआ है आओ तक़रीब-ए-रू-नुमाई करें पाँव में एक आबला हुआ है फिर वही बहस छेड़ देते हो इतनी मुश्किल से राब्ता हुआ है रात की वारदात मत पूछो वाक़ई एक वाक़िआ' हुआ है लग रहा है ये नर्म लहजे से फिर तुझे कोई मसअला हुआ है मैं कहाँ और वो फ़सील कहाँ फ़ासले का ही फ़ैसला हुआ है इतना मसरूफ़ हो गया हूँ कि बस 'मीर' भी इक तरफ़ पड़ा हुआ है आज कुछ भी नहीं हुआ 'जव्वाद' हाँ मगर एक सानेहा हुआ है
Jawwad Sheikh
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दाद तो बा'द में कमाएँगे पहले हम सोचना सिखाएँगे मैं कहीं जा नहीं रहा लेकिन आप क्या मेरे साथ आएँगे कोई खिड़की खुलेगी रात गए कई अपनी मुराद पाएँगे खुल के रोने पे इख़्तियार नहीं हम कोई जश्न क्या मनाएँगे हँसेंगे तेरी बद-हवा सेी पर लोग रस्ता नहीं बताएँगे तुम उठाओगे कोई रंज मिरा दोस्त अहबाब हज़ उठाएँगे हमें अपनी तलाश में मत भेज खड़ी फ़सलें उजाड़ आएँगे
Jawwad Sheikh
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न सही ऐश गुज़ारा ही सही या'नी गर तू नहीं दुनिया ही सही छोड़िए कुछ तो मेरा भी मुझ में ख़ून का आख़िरी क़तरा ही सही ग़ौर तो कीजे मेरी बातों पर उम्र में आप से छोटा ही सही रंज हम ने भी जुदा पाए हैं आप यकता हैं तो यकता ही सही मैं बुरा हूँ तो हूँ अब क्या कीजे कोई अच्छा है तो अच्छा ही सही किस को सीने से लगाऊँ तेरे बा'द जाते जाते कोई धोका ही सही कर कुछ ऐसा कि तुझे याद रखूँ भूल जाने का तक़ाज़ा ही सही तुम पे कब रोक थी चलते जाते मेरी सोचों पे तो पहरा ही सही वो किसी तौर न होगा मेरा चलो ऐसा है तो ऐसा ही सही सुर्ख़ करने लगी हर शय 'जव्वाद' याद का रंग सुनहरा ही सही
Jawwad Sheikh
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