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सब को बचाओ ख़ुद भी बचो फ़ासला रखो अब और कुछ करो न करो फ़ासला रखो ख़तरा तो मुफ़्त में भी नहीं लेना चाहिए घर से निकल के मोल न लो फ़ासला रखो फ़िलहाल इस से बचने का है एक रास्ता वो ये कि इस से बच के रहो फ़ासला रखो दुश्मन है और तरह का जंग और तरह की आगे बढ़ो न पीछे हटो फ़ासला रखो

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं

Umair Najmi

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उस ने कोई तो दम पढ़ा हुआ है जिस ने देखा वो मुब्तला हुआ है अब तिरे रास्ते से बच निकलूँ इक यही रास्ता बचा हुआ है आओ तक़रीब-ए-रू-नुमाई करें पाँव में एक आबला हुआ है फिर वही बहस छेड़ देते हो इतनी मुश्किल से राब्ता हुआ है रात की वारदात मत पूछो वाक़ई एक वाक़िआ' हुआ है लग रहा है ये नर्म लहजे से फिर तुझे कोई मसअला हुआ है मैं कहाँ और वो फ़सील कहाँ फ़ासले का ही फ़ैसला हुआ है इतना मसरूफ़ हो गया हूँ कि बस 'मीर' भी इक तरफ़ पड़ा हुआ है आज कुछ भी नहीं हुआ 'जव्वाद' हाँ मगर एक सानेहा हुआ है

Jawwad Sheikh

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ग़म-ए-जहाँ से मैं उकता गया तो क्या होगा ख़ुद अपनी फ़िक्र में घुलने लगा तो क्या होगा ये ना-गुज़ीर है उम्मीद की नुमू के लिए गुज़रता वक़्त कहीं थम गया तो क्या होगा यही बहुत है कि हम को सुकूँ से जीने दे किसी के हाथों हमारा भला तो क्या होगा ये लोग मेरी ख़मोशी पे मुझ से नालाँ हैं कोई ये पूछे मैं गोया हुआ तो क्या होगा मैं इस लिए भी बहुत मुख़्तलिफ़ हूँ लोगों से वो सोचते हैं कि ऐसा हुआ तो क्या होगा जुनूँ की राह अजब है कि पाँव धरने को ज़मीन तक भी नहीं नक़्श-ए-पा तो क्या होगा ये एक ख़ौफ़ भी मेरी ख़ुशी में शामिल है तिरा भी ध्यान अगर हट गया तो क्या होगा जो हो रहा है वो होता चला गया तो फिर? जो होने को है वही हो गया तो क्या होगा

Jawwad Sheikh

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हज़ार सहरा थे रस्ते में यार क्या करता जो चल पड़ा था तो फ़िक्र-ए-ग़ुबार क्या करता कभी जो ठीक से ख़ुद को समझ नहीं पाया वो दूसरों पे भला ए'तिबार क्या करता चलो ये माना कि इज़हार भी ज़रूरी है सो एक बार किया, बार बार क्या करता इसी लिए तो दर-ए-आइना भी वा न किया जो सो रहे हैं उन्हें होशियार क्या करता वो अपने ख़्वाब की तफ़्सीर ख़ुद न कर पाया जहान भर पे उसे आश्कार क्या करता अगर वो करने पे आता तो कुछ भी कर जाता ये सोच मत कि अकेला शरार क्या करता सिवाए ये कि वो अपने भी ज़ख़्म ताज़ा करे मिरे ग़मों पे मिरा ग़म-गुसार क्या करता बस एक फूल की ख़ातिर बहार माँगी थी रुतों से वर्ना मैं क़ौल-ओ-क़रार क्या करता मिरा लहू ही कहानी का रंग था 'जव्वाद' कहानी-कार उसे रंग-दार क्या करता

Jawwad Sheikh

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दाद तो बा'द में कमाएँगे पहले हम सोचना सिखाएँगे मैं कहीं जा नहीं रहा लेकिन आप क्या मेरे साथ आएँगे कोई खिड़की खुलेगी रात गए कई अपनी मुराद पाएँगे खुल के रोने पे इख़्तियार नहीं हम कोई जश्न क्या मनाएँगे हँसेंगे तेरी बद-हवा सेी पर लोग रस्ता नहीं बताएँगे तुम उठाओगे कोई रंज मिरा दोस्त अहबाब हज़ उठाएँगे हमें अपनी तलाश में मत भेज खड़ी फ़सलें उजाड़ आएँगे

Jawwad Sheikh

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न सही ऐश गुज़ारा ही सही या'नी गर तू नहीं दुनिया ही सही छोड़िए कुछ तो मेरा भी मुझ में ख़ून का आख़िरी क़तरा ही सही ग़ौर तो कीजे मेरी बातों पर उम्र में आप से छोटा ही सही रंज हम ने भी जुदा पाए हैं आप यकता हैं तो यकता ही सही मैं बुरा हूँ तो हूँ अब क्या कीजे कोई अच्छा है तो अच्छा ही सही किस को सीने से लगाऊँ तेरे बा'द जाते जाते कोई धोका ही सही कर कुछ ऐसा कि तुझे याद रखूँ भूल जाने का तक़ाज़ा ही सही तुम पे कब रोक थी चलते जाते मेरी सोचों पे तो पहरा ही सही वो किसी तौर न होगा मेरा चलो ऐसा है तो ऐसा ही सही सुर्ख़ करने लगी हर शय 'जव्वाद' याद का रंग सुनहरा ही सही

Jawwad Sheikh

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