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jab hua irfan to ghham aram-e-jan banta gaya soz-e-janan dil men soz-e-digaran banta gaya rafta rafta munqalib hoti gai rasm-e-chaman dhire dhire naghhma-e-dil bhi fughhan banta gaya main akela hi chala tha janib-e-manzil magar log saath aate gae aur karvan banta gaya main to jab janun ki bhar de saghhar-e-har-khas-o-am yuun to jo aaya vahi pir-e-mughhan banta gaya jis taraf bhi chal pade ham abla-payan-e-shauq khaar se gul aur gul se gulsitan banta gaya sharh-e-ghham to mukhtasar hoti gai us ke huzur lafz jo munh se na nikla dastan banta gaya dahr men 'majruh' koi javedan mazmun kahan main jise chhuta gaya vo javedan banta gaya jab hua irfan to gham aaram-e-jaan banta gaya soz-e-jaanan dil mein soz-e-digaran banta gaya rafta rafta munqalib hoti gai rasm-e-chaman dhire dhire naghma-e-dil bhi fughan banta gaya main akela hi chala tha jaanib-e-manzil magar log sath aate gae aur karwan banta gaya main to jab jaanun ki bhar de saghar-e-har-khas-o-am yun to jo aaya wahi pir-e-mughan banta gaya jis taraf bhi chal pade hum aabla-payan-e-shauq khar se gul aur gul se gulsitan banta gaya sharh-e-gham to mukhtasar hoti gai us ke huzur lafz jo munh se na nikla dastan banta gaya dahr mein 'majruh' koi jawedan mazmun kahan main jise chhuta gaya wo jawedan banta gaya

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम यूँँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया

Majrooh Sultanpuri

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आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा हाँ मुझे देख मुझे अब मेरी तस्वीर न देख ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ता'बीर न देख देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख वही 'मजरूह' वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख

Majrooh Sultanpuri

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जला के मिश'अल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़ जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले हुआ असीर कोई हम-नवा तो दूर तलक ब-पास-ए-तर्ज़-ए-नवा हम भी साथ साथ चले बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले फिर आई फ़स्ल कि मानिंद बर्ग-ए-आवारा हमारे नाम गुलों के मुरासलात चले क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ 'मजरूह' बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले

Majrooh Sultanpuri

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यूँँ तो आपस में बिगड़ते हैं ख़फ़ा होते हैं मिलने वाले कहीं उल्फ़त में जुदा होते हैं हैं ज़माने में अजब चीज़ मोहब्बत वाले दर्द ख़ुद बनते हैं ख़ुद अपनी दवा होते हैं हाल-ए-दिल मुझ से न पूछो मिरी नज़रें देखो राज़ दिल के तो निगाहों से अदा होते हैं मिलने को यूँँ तो मिला करती हैं सब से आँखें दिल के आ जाने के अंदाज़ जुदा होते हैं ऐसे हंस हंस के न देखा करो सब की जानिब लोग ऐसी ही अदाओं पे फ़िदा होते हैं

Majrooh Sultanpuri

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हमारे बा'द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे बहारें हम को ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होंगे इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गाएगी दुनिया मोहब्बत फिर हसीं होगी नज़ारे फिर जवाँ होंगे न हम होंगे न तुम होगे न दिल होगा मगर फिर भी हज़ारों मंज़िलें होंगी हज़ारों कारवाँ होंगे

Majrooh Sultanpuri

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