जब हम मुट्ठी खोलेंगे नई कहानी खोलेंगे ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं देर से पट्टी खोलेंगे चेहरा पढ़ने वाले चोर गठरी थोड़ी खोलेंगे दिल का वहम निकालेंगे गले की डोरी खोलेंगे वो ख़ुद थोड़ी आएगा नौकर कुंडी खोलेंगे ज़ोर से गाँठ लगाई थी दाँत से रस्सी खोलेंगे
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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झुक के चलता हूँ कि क़द उस के बराबर न लगे दूसरा ये कि उसे राह में ठोकर न लगे ये तेरे साथ तअ'ल्लुक़ का बड़ा फ़ाइदा है आदमी हो भी तो औक़ात से बाहर न लगे नीम तारीक सा माहौल है दरकार मुझे ऐसा माहौल जहाँ आँख लगे डर न लगे माँओं ने चूमना होते हैं बुरीदा सर भी उस से कहना कि कोई ज़ख़्म जबीं पर न लगे ये तलबगार निगाहों के तक़ाज़े हर सू कोई तो ऐसी जगह हो जो मुझे घर न लगे ये जो आईना है देखूँ तो ख़ला दिखता है इस जगह कुछ भी न लगवाऊँ तो बेहतर न लगे तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे
Umair Najmi
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सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए शहर की सारी अलिफ़-लैलाएँ बूढ़ी हो चुकीं शाहज़ादे को कोई ताज़ा कहानी चाहिए मैं ने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए
Rahat Indori
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तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई कुछ आँखों में तो हो गया आबाद वो चेहरा कुछ बस्तियों में आज भी बिजली नहीं आई हर रोज़ पलट आते थे मेहमान किसी के हर रोज़ ये कहते थे कि गाड़ी नहीं आई वो आग बुझी तो हमें मौसम ने झिंझोड़ा वर्ना यही लगता था कि सर्दी नहीं आई शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई
Khurram Afaq
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हमें भी काम बहुत है ख़ज़ाने से उस के ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के यही न हो कि तवज्जोह हटा ले वो अपनी ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के वो चढ़ रहा था जुदाई की सीढ़ियाँ 'ख़ुर्रम' सरक रहा था मिरा हाथ शाने से उस के
Khurram Afaq
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बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं जो तेरे साथ उठते बैठते हैं अकेले बैठना होगा किसी को अगर हम तुम इकट्ठे बैठते हैं और अब उठना पड़ा ना अगली सफ़ से कहा भी था कि पीछे बैठते हैं यहीं पर सिलसिला मौक़ूफ़ कर दो ज़ियादा तजरबे ले बैठते हैं निगाहें क्यूँँ न ठहरें उस पे 'आफ़ाक़' शजर पर ही परिंदे बैठते हैं
Khurram Afaq
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बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी हम निहत्थो पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं उस ने आँखें अगर बंद कर लिए तो बाँहे खुले छोड़ दी क्या अनोखा यक़ीं था जो उस दिन उतारा गया शहर पर घर पलटते हुए ताजिरो ने दुकानें खुली छोड़ दी मेरे क़ाबू में हो कर भी वो इतना सरकश है तो सोचिए क्या बनेगा अगर मैं ने उस की लगा में खुली छोड़ दी जिस ने आते हुए मेरी तरतीब पर इतने जुमले कसे उस ने जाते हुए मेरे दिल की दराज़ें खुले छोड़ दी
Khurram Afaq
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हम तो समझे थे मोहब्बत की लड़ाई साहब आप तलवार उठा लाए हैं भाई साहब धूप तालाब का हुलिया तो बदल सकती है इतनी आसानी से छुटती नहीं काई साहब ख़ाक को ख़ाक पे धरने का मज़ा अपना है हिज्र में कौन बिछाता है चटाई साहब फिर भी आवारगी ज़ाएअ' नहीं जाने वाली कोई भी चीज़ अगर हाथ न आई साहब
Khurram Afaq
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