ghazalKuch Alfaaz

बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी हम निहत्थो पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं उस ने आँखें अगर बंद कर लिए तो बाँहे खुले छोड़ दी क्या अनोखा यक़ीं था जो उस दिन उतारा गया शहर पर घर पलटते हुए ताजिरो ने दुकानें खुली छोड़ दी मेरे क़ाबू में हो कर भी वो इतना सरकश है तो सोचिए क्या बनेगा अगर मैं ने उस की लगा में खुली छोड़ दी जिस ने आते हुए मेरी तरतीब पर इतने जुमले कसे उस ने जाते हुए मेरे दिल की दराज़ें खुले छोड़ दी

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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हमें भी काम बहुत है ख़ज़ाने से उस के ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के यही न हो कि तवज्जोह हटा ले वो अपनी ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के वो चढ़ रहा था जुदाई की सीढ़ियाँ 'ख़ुर्रम' सरक रहा था मिरा हाथ शाने से उस के

Khurram Afaq

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तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई कुछ आँखों में तो हो गया आबाद वो चेहरा कुछ बस्तियों में आज भी बिजली नहीं आई हर रोज़ पलट आते थे मेहमान किसी के हर रोज़ ये कहते थे कि गाड़ी नहीं आई वो आग बुझी तो हमें मौसम ने झिंझोड़ा वर्ना यही लगता था कि सर्दी नहीं आई शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई

Khurram Afaq

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जब हम मुट्ठी खोलेंगे नई कहानी खोलेंगे ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं देर से पट्टी खोलेंगे चेहरा पढ़ने वाले चोर गठरी थोड़ी खोलेंगे दिल का वहम निकालेंगे गले की डोरी खोलेंगे वो ख़ुद थोड़ी आएगा नौकर कुंडी खोलेंगे ज़ोर से गाँठ लगाई थी दाँत से रस्सी खोलेंगे

Khurram Afaq

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हम तो समझे थे मोहब्बत की लड़ाई साहब आप तलवार उठा लाए हैं भाई साहब धूप तालाब का हुलिया तो बदल सकती है इतनी आसानी से छुटती नहीं काई साहब ख़ाक को ख़ाक पे धरने का मज़ा अपना है हिज्र में कौन बिछाता है चटाई साहब फिर भी आवारगी ज़ाएअ' नहीं जाने वाली कोई भी चीज़ अगर हाथ न आई साहब

Khurram Afaq

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बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं जो तेरे साथ उठते बैठते हैं अकेले बैठना होगा किसी को अगर हम तुम इकट्ठे बैठते हैं और अब उठना पड़ा ना अगली सफ़ से कहा भी था कि पीछे बैठते हैं यहीं पर सिलसिला मौक़ूफ़ कर दो ज़ियादा तजरबे ले बैठते हैं निगाहें क्यूँँ न ठहरें उस पे 'आफ़ाक़' शजर पर ही परिंदे बैठते हैं

Khurram Afaq

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