हमें भी काम बहुत है ख़ज़ाने से उस के ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के यही न हो कि तवज्जोह हटा ले वो अपनी ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के वो चढ़ रहा था जुदाई की सीढ़ियाँ 'ख़ुर्रम' सरक रहा था मिरा हाथ शाने से उस के
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ
Mehshar Afridi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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तूफ़ान की उम्मीद थी आँधी नहीं आई वो आप तो क्या उस की ख़बर भी नहीं आई कुछ आँखों में तो हो गया आबाद वो चेहरा कुछ बस्तियों में आज भी बिजली नहीं आई हर रोज़ पलट आते थे मेहमान किसी के हर रोज़ ये कहते थे कि गाड़ी नहीं आई वो आग बुझी तो हमें मौसम ने झिंझोड़ा वर्ना यही लगता था कि सर्दी नहीं आई शायद वो मोहब्बत के लिए ठीक नहीं था शायद ये अँगूठी उसे पूरी नहीं आई
Khurram Afaq
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जब हम मुट्ठी खोलेंगे नई कहानी खोलेंगे ज़ख़्म की इज़्ज़त करते हैं देर से पट्टी खोलेंगे चेहरा पढ़ने वाले चोर गठरी थोड़ी खोलेंगे दिल का वहम निकालेंगे गले की डोरी खोलेंगे वो ख़ुद थोड़ी आएगा नौकर कुंडी खोलेंगे ज़ोर से गाँठ लगाई थी दाँत से रस्सी खोलेंगे
Khurram Afaq
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बड़ी मुश्किल से नीचे बैठते हैं जो तेरे साथ उठते बैठते हैं अकेले बैठना होगा किसी को अगर हम तुम इकट्ठे बैठते हैं और अब उठना पड़ा ना अगली सफ़ से कहा भी था कि पीछे बैठते हैं यहीं पर सिलसिला मौक़ूफ़ कर दो ज़ियादा तजरबे ले बैठते हैं निगाहें क्यूँँ न ठहरें उस पे 'आफ़ाक़' शजर पर ही परिंदे बैठते हैं
Khurram Afaq
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बात करते हुए बे-ख़याली में ज़ुल्फ़ें खुली छोड़ दी हम निहत्थो पे उस ने ये कैसी बलाएँ खुली छोड़ दी साथ जब तक रहे एक लम्हे को भी रब्त टूटा नहीं उस ने आँखें अगर बंद कर लिए तो बाँहे खुले छोड़ दी क्या अनोखा यक़ीं था जो उस दिन उतारा गया शहर पर घर पलटते हुए ताजिरो ने दुकानें खुली छोड़ दी मेरे क़ाबू में हो कर भी वो इतना सरकश है तो सोचिए क्या बनेगा अगर मैं ने उस की लगा में खुली छोड़ दी जिस ने आते हुए मेरी तरतीब पर इतने जुमले कसे उस ने जाते हुए मेरे दिल की दराज़ें खुले छोड़ दी
Khurram Afaq
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हम तो समझे थे मोहब्बत की लड़ाई साहब आप तलवार उठा लाए हैं भाई साहब धूप तालाब का हुलिया तो बदल सकती है इतनी आसानी से छुटती नहीं काई साहब ख़ाक को ख़ाक पे धरने का मज़ा अपना है हिज्र में कौन बिछाता है चटाई साहब फिर भी आवारगी ज़ाएअ' नहीं जाने वाली कोई भी चीज़ अगर हाथ न आई साहब
Khurram Afaq
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