ghazalKuch Alfaaz

जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है यादों के दरीचों में चिलमन सी सरकती है लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए यूँँ याद तिरी शब भर सीने में सुलगती है यूँँ प्यार नहीं छुपता पलकों के झुकाने से आँखों के लिफ़ाफ़ों में तहरीर चमकती है ख़ुश-रंग परिंदों के लौट आने के दिन आए बिछड़े हुए मिलते हैं जब बर्फ़ पिघलती है शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

Bashir Badr10 Likes

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

Bashir Badr

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सुब्ह का झरना हमेशा हँसने वाली औरतें झुट-पुटे की नद्दियाँ ख़ामोश गहरी औरतें मो'तदिल कर देती हैं ये सर्द मौसम का मिज़ाज बर्फ़ के टीलों पे चढ़ती धूप जैसी औरतें सब्ज़ नारंजी सुनहरी खट्टी मीठी लड़कियाँ भारी जिस्मों वाली टपके आम जैसी औरतें सड़कों बाज़ारों मकानों दफ़्तरों में रात दिन लाल नीली सब्ज़ नीली जलती बुझती औरतें शहर में इक बाग़ है और बाग़ में तालाब है तैरती हैं इस में सातों रंग वाली औरतें सैकड़ों ऐसी दुकानें हैं जहाँ मिल जाएँगी धात की पत्थर की शीशे की रबड़ की औरतें मुंजमिद हैं बर्फ़ में कुछ आग के पैकर अभी मक़बरों की चादरें हैं फूल जैसी औरतें उन के अंदर पक रहा है वक़्त का आतिश-फ़िशाँ जिन पहाड़ों को ढके हैं बर्फ़ जैसी औरतें आँसुओं की तरह तारे गिर रहे हैं अर्श से रो रही हैं आसमानों की अकेली औरतें ग़ौर से सूरज निकलते वक़्त देखो आसमाँ चूमती हैं किस का माथा उजली लंबी औरतें सब्ज़ सोने के पहाड़ों पर क़तार-अंदर-क़तार सर से सर जोड़े खड़ी हैं लंबी सीधी औरतें वाक़ई दोनों बहुत मज़लूम हैं नक़्क़ाद और माँ कहे जाने की हसरत में सुलगती औरतें

Bashir Badr

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इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके सुब्ह फिर हम ये कफ़न पहनाएँगे जज़्बात को पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को आब ओ ख़ाक ओ बा'द में भी लहर वो आ जाए है सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम इक सफ़र के बा'द फिर खुलते हैं आधी रात को सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे मामता का जिस्म माँगे ज़िंदगी की बात को

Bashir Badr

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दिल में इक तस्वीर छुपी थी आन बसी है आँखों में शायद हम ने आज ग़ज़ल सी बात लिखी है आँखों में जैसे इक हरीजन लड़की मंदिर के दरवाज़े पर शाम दियों की थाल सजाए झाँक रही है आँखों में इस रूमाल को काम में लाओ अपनी पलकें साफ़ करो मैला मैला चाँद नहीं है धूल जमी है आँखों में पढ़ता जा ये मंज़र-नामा ज़र्द अज़ीम पहाड़ों का धूप खिली पलकों के ऊपर बर्फ़ जमी है आँखों में मैं ने इक नॉवेल लिक्खा है आने वाली सुब्ह के नाम कितनी रातों का जागा हूँ नींद भरी है आँखों में

Bashir Badr

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कभी यूँँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़ दे मगर इस के बा'द सहर न हो वो बड़ा रहीम ओ करीम है मुझे ये सिफ़त भी अता करे तुझे भूलने की दुआ करूँँ तो मिरी दुआ में असर न हो मिरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी न उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र न हो ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँख में पिछली रात की चाँदनी न बुझे ख़राबे की रौशनी कभी बे-चराग़ ये घर न हो कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के यूँँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

Bashir Badr

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