ghazalKuch Alfaaz

जब तक निगार-ए-दश्त का सीना दुखा न था सहरा में कोई लाला-ए-सहरा खिला न था दो झीलें उस की आँखों में लहरा के सो गईं उस वक़्त मेरी उम्र का दरिया चढ़ा न था जागी न थीं नसों में तमन्ना की नागिनें उस गंदुमी शराब को जब तक चखा न था ढूँडा करो जहान-ए-तहय्युर में उम्र भर वो चलती फिरती छाँव है मैं ने कहा न था इक बे-वफ़ा के सामने आँसू बहाते हम इतना हमारी आँख का पानी मरा न था वो काले होंट जाम समझ कर चढ़ा गए वो आब जिस से मैं ने वुज़ू तक किया न था सब लोग अपने अपने ख़ुदाओं को लाए थे एक हम ऐसे थे कि हमारा ख़ुदा न था वो काली आँखें शहर में मशहूर थीं बहुत तब उन पे मोटे शीशों का चश्मा चढ़ा न था मैं साहिब-ए-ग़ज़ल था हसीनों की बज़्म में सर पर घनेरे बाल थे माथा खुला न था

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है इक ज़ेहन-ए-परेशाँ में ख़्वाब-ए-ग़ज़लिस्ताँ है पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है दिल से जो छटे बादल तो आँख में सावन है ठहरा हुआ दरिया है बहता हुआ पानी है हम-रंग-ए-दिल-ए-पुर-ख़ूँ हर लाला-ए-सहराई गेसू की तरह मुज़्तर अब रात की रानी है जिस संग पे नज़रें कीं ख़ुर्शीद-ए-हक़ीक़त है जिस चाँद से मुँह मोड़ा पत्थर की कहानी है ऐ पीर-ए-ख़िरद-मंदाँ दिल की भी ज़रूरत है ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ है ये मुल्क-ए-जवानी है ग़म वज्ह-ए-फ़िगार-ए-दिल ग़म वज्ह-ए-क़रार-ए-दिल आँसू कभी शीशा है आँसू कभी पानी है इस हौसला-ए-दिल पर हम ने भी कफ़न पहना हँस कर कोई पूछेगा क्या जान गँवानी है दिन तल्ख़ हक़ाएक़ के सहराओं का सूरज है शब गेसु-ए-अफ़्साना यादों की कहानी है वो हुस्न जिसे हम ने रुस्वा किया दुनिया में नादीदा हक़ीक़त है ना-गुफ़्ता कहानी है वो मिस्रा-ए-आवारा दीवानों पे भारी है जिस में तिरे गेसू की बे-रब्त कहानी है हम ख़ुशबू-ए-आवारा हम नूर-ए-परेशाँ हैं ऐ 'बद्र' मुक़द्दर में आशुफ़्ता-बयानी है

Bashir Badr

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फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है मुझे सहरस नई एक शाम लेना है किसे ख़बर कि फ़रिश्ते ग़ज़ल समझते हैं ख़ुदा के सामने काफ़िर का नाम लेना है मुआ'मला है तिरा बदतरीन दुश्मन से मिरे अज़ीज़ मोहब्बत से काम लेना है महकती ज़ुल्फ़ों से ख़ुशबू चमकती आँख से धूप शबों से जाम-ए-सहर का सलाम लेना है तुम्हारी चाल की आहिस्तगी के लहजे में सुख़न से दिल को मसलने का काम लेना है नहीं मैं 'मीर' के दर पर कभी नहीं जाता मुझे ख़ुदा से ग़ज़ल का कलाम लेना है बड़े सलीक़े से नोटों में उस को तुल्वा कर अमीर-ए-शहरस अब इंतिक़ाम लेना है

Bashir Badr

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चमक रही है परों में उड़ान की ख़ुशबू बुला रही है बहुत आसमान की ख़ुशबू भटक रही है पुरानी दुलाइयाँ ओढ़े हवेलियों में मिरे ख़ानदान की ख़ुशबू सुना के कोई कहानी हमें सुलाती थी दु'आओं जैसी बड़े पान-दान की ख़ुशबू दबा था फूल कोई मेज़-पोश के नीचे गरज रही थी बहुत पेचवान की ख़ुशबू अजब वक़ार था सूखे सुनहरे बालों में उदासियों की चमक ज़र्द लॉन की ख़ुशबू वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुशबू ग़ज़ल की शाख़ पे इक फूल खिलने वाला है बदन से आने लगी ज़ाफ़रान की ख़ुशबू इमारतों की बुलंदी पे कोई मौसम क्या कहाँ से आ गई कच्चे मकान की ख़ुशबू गुलों पे लिखती हुई ला-इलाहा-इल्लल्लाह पहाड़ियों से उतरती अज़ान की ख़ुशबू

Bashir Badr

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अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे वो आइना है तो फिर आइना दिखाए मुझे अजब चराग़ हूँ दिन रात जलता रहता हूँ मैं थक गया हूँ हवा से कहो बुझाए मुझे मैं जिस की आँख का आँसू था उस ने क़द्र न की बिखर गया हूँ तो अब रेत से उठाए मुझे बहुत दिनों से मैं इन पत्थरों में पत्थर हूँ कोई तो आए ज़रा देर को रुलाये मुझे मैं चाहता हूँ कि तुम ही मुझे इजाज़त दो तुम्हारी तरह से कोई गले लगाए मुझे

Bashir Badr

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वो चाँदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिए बनाया है कहाँ से आई ये ख़ुशबू ये घर की ख़ुशबू है इस अजनबी के अँधेरे में कौन आया है महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है उसे किसी की मोहब्बत का ए'तिबार नहीं उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है तमाम उम्र मिरा दिल उसी धुएँ में घुटा वो इक चराग़ था मैं ने उसे बुझाया है

Bashir Badr

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