ghazalKuch Alfaaz

जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख इक रोज़ मेरी जान ये हरकत भी कर के देख मंज़िल यहीं है आम के पेड़ों की छाँव में ऐ शहसवार घोड़े से नीचे उतर के देख टूटे पड़े हैं कितने उजालों के उस्तुख़्वाँ साया-नुमा अँधेरे के अंदर उतर के देख फूलों की तंग-दामनी का तज़्किरा न कर ख़ुशबू की तरह मौज-ए-सबा में बिखर के देख तुझ पर खुलेंगे मौत की सरहद के रास्ते हिम्मत अगर है उस की गली से गुज़र के देख दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं तन्हाई कितनी गहरी है इक जाम भर के देख

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा मिरी पत्तियाँ सारी सूखी हुईं नए मौसमों में बिखर जाऊँगा अगर आ गया आइना सामने तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है न आई नज़र तो किधर जाऊँगा वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा पलट कर न पाया किसी को अगर तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा तिरी ज़ात में साँस ली है सदा तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा

Adil Mansuri

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बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था मैं हाथ में तलवार लिए झूम रहा था घूँघट में मिरे ख़्वाब की ता'बीर छुपी थी मेहंदी से हथेली में मिरा नाम लिखा था लब थे कि किसी प्याली के होंटों पे झुके थे और हाथ कहीं गर्दन-ए-मीना में पड़ा था हम्माम के आईने में शब डूब रही थी सिगरेट से नए दिन का धुआँ फैल रहा था दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी और पानी की तह में वो मुझे ढूँढ़ रहा था मालूम नहीं फिर वो कहाँ छुप गया 'आदिल' साया सा कोई लम्स की सरहद पे मिला था

Adil Mansuri

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चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई सूरज को ढलता देख के फिर शाम डर गई मबहूत से खड़े रहे सब बस की लाइन में कूल्हे उछालती हुई बिजली गुज़र गई सूरज वही था धूप वही शहर भी वही क्या चीज़ थी जो जिस्म के अंदर ठिठर गई ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई तहलील हो गई है हवा में उदासियाँ ख़ाली जगह जो रह गई तन्हाई भर गई चेहरे बग़ैर निकला था उस के मकान से रुस्वाइयों की हद से भी आगे ख़बर गई रंगों की सुर्ख़ नाफ़ दाखिल्या गुल-आफ़ताब अंधी हवाएँ ख़ार खटक कान भर गई

Adil Mansuri

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चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो 'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो

Adil Mansuri

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दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का झोंका हवा का खिड़की के पर्दे हिला गया वो जान-ए-नौ-बहार जिधर से गुज़र गया पेड़ों ने फूल पत्तों से रस्ता छुपा लिया उस के क़रीब जाने का अंजाम ये हुआ मैं अपने-आप से भी बहुत दूर जा पड़ा अँगड़ाई ले रही थी गुलिस्ताँ में जब बहार हर फूल अपने रंग की आतिश में जल गया काँटे से टूटते हैं मिरे अंग अंग में रग रग में चाँद जलता हुआ ज़हर भर गया आँखों ने उस को देखा नहीं इस के बावजूद दिल उस की याद से कभी ग़ाफ़िल नहीं रहा दरवाज़ा खटखटा के सितारे चले गए ख़्वाबों की शाल ओढ़ के मैं ऊँघता रहा शब चाँदनी की आँच में तप कर निखर गई सूरज की जलती आग में दिन ख़ाक हो गया सड़कें तमाम धूप से अँगारा हो गईं अंधी हवाएँ चलती हैं इन पर बरहना-पा वो आए थोड़ी देर रुके और चले गए 'आदिल' मैं सर झुकाए हुए चुप खड़ा रहा

Adil Mansuri

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