ghazalKuch Alfaaz

jo us ne kiya use sila de maula mujhe sabr ki jaza de ya mere diye ki lau badha de ya raat ko subh se mila de sach huun to mujhe amar bana de jhuta huun to naqsh sab mita de ye qaum ajiib ho gai hai is qaum ko khu-e-ambiya de utrega na koi asman se ik aas men dil magar sada de bachchon ki tarah ye lafz mere maabud inhen bolna sikha de dukh dahr ke apne naam likkhun har dukh mujhe zaat ka maza de ik mera vajud sun raha hai ilham jo raat ki hava de mujh se mira koi milne vaala bichhda to nahin magar mila de chehra mujhe apna dekhne ko ab dast-e-havas men aina de jis shakhs ne umar-e-hijr kaati us shakhs ko ek raat kya de dukhta hai badan ki phir mile vo mil jaae to ruuh ko dikha de kya chiiz hai khvahish-e-badan bhi har baar naya hi zaiqa de chhune men ye dar ki mar na jaun chhu luun to vo zindagi siva de jo us ne kiya use sila de maula mujhe sabr ki jaza de ya mere diye ki lau badha de ya raat ko subh se mila de sach hun to mujhe amar bana de jhuta hun to naqsh sab mita de ye qaum ajib ho gai hai is qaum ko khu-e-ambiya de utrega na koi aasman se ek aas mein dil magar sada de bachchon ki tarah ye lafz mere mabud inhen bolna sikha de dukh dahr ke apne nam likkhun har dukh mujhe zat ka maza de ek mera wajud sun raha hai ilham jo raat ki hawa de mujh se mera koi milne wala bichhda to nahin magar mila de chehra mujhe apna dekhne ko ab dast-e-hawas mein aaina de jis shakhs ne umar-e-hijr kati us shakhs ko ek raat kya de dukhta hai badan ki phir mile wo mil jae to ruh ko dikha de kya chiz hai khwahish-e-badan bhi har bar naya hi zaiqa de chhune mein ye dar ki mar na jaun chhu lun to wo zindagi siwa de

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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जो उस ने किया उसे सिला दे मौला मुझे सब्र की जज़ा दे या मेरे दिए की लौ बढ़ा दे या रात को सुब्ह से मिला दे सच हूँ तो मुझे अमर बना दे झूटा हूँ तो नक़्श सब मिटा दे ये क़ौम अजीब हो गई है इस क़ौम को ख़ू-ए-अम्बिया दे उतरेगा न कोई आसमाँ से इक आस में दिल मगर सदा दे बच्चों की तरह ये लफ़्ज़ मेरे माबूद इन्हें बोलना सिखा दे दुख दहर के अपने नाम लिक्खूँ हर दुख मुझे ज़ात का मज़ा दे इक मेरा वजूद सुन रहा है इल्हाम जो रात की हवा दे मुझ से मिरा कोई मिलने वाला बिछड़ा तो नहीं मगर मिला दे चेहरा मुझे अपना देखने को अब दस्त-ए-हवस में आईना दे जिस शख़्स ने उम्र-ए-हिज्र काटी उस शख़्स को एक रात क्या दे दुखता है बदन कि फिर मिले वो मिल जाए तो रूह को दिखा दे क्या चीज़ है ख़्वाहिश-ए-बदन भी हर बार नया ही ज़ाइक़ा दे छूने में ये डर कि मर न जाऊँ छू लूँ तो वो ज़िंदगी सिवा दे

Obaidullah Aleem

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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ

Obaidullah Aleem

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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था

Obaidullah Aleem

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गुज़रो न इस तरह कि तमाशा नहीं हूँ मैं समझो कि अब हूँ और दोबारा नहीं हूँ मैं इक तब्अ' रंग रंग थी सो नज़्र-ए-गुल हुई अब ये कि अपने साथ भी रहता नहीं हूँ मैं तुम ने भी मेरे साथ उठाए हैं दुख बहुत ख़ुश हूँ कि राह-ए-शौक़ में तन्हा नहीं हूँ मैं पीछे न भाग वक़्त की ऐ ना-शनास धूप सायों के दरमियान हूँ साया नहीं हूँ मैं जो कुछ भी हूँ मैं अपनी ही सूरत में हूँ 'अलीम' 'ग़ालिब' नहीं हूँ 'मीर'-ओ-'यगाना' नहीं हूँ मैं

Obaidullah Aleem

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बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स हुआ चराग़ तो घर ही जला गया इक शख़्स तमाम रंग मिरे और सारे ख़्वाब मिरे फ़साना थे कि फ़साना बना गया इक शख़्स मैं किस हवा में उड़ूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स पलट सकूँ ही न आगे ही बढ़ सकूँ जिस पर मुझे ये कौन से रस्ते लगा गया इक शख़्स मोहब्बतें भी अजब उस की नफ़रतें भी कमाल मिरी ही तरह का मुझ में समा गया इक शख़्स मोहब्बतों ने किसी की भुला रखा था उसे मिले वो ज़ख़्म कि फिर याद आ गया इक शख़्स खुला ये राज़ कि आईना-ख़ाना है दुनिया और उस में मुझ को तमाशा बना गया इक शख़्स

Obaidullah Aleem

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