ghazalKuch Alfaaz

बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स हुआ चराग़ तो घर ही जला गया इक शख़्स तमाम रंग मिरे और सारे ख़्वाब मिरे फ़साना थे कि फ़साना बना गया इक शख़्स मैं किस हवा में उड़ूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स पलट सकूँ ही न आगे ही बढ़ सकूँ जिस पर मुझे ये कौन से रस्ते लगा गया इक शख़्स मोहब्बतें भी अजब उस की नफ़रतें भी कमाल मिरी ही तरह का मुझ में समा गया इक शख़्स मोहब्बतों ने किसी की भुला रखा था उसे मिले वो ज़ख़्म कि फिर याद आ गया इक शख़्स खुला ये राज़ कि आईना-ख़ाना है दुनिया और उस में मुझ को तमाशा बना गया इक शख़्स

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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जाम सिगरेट कश और बस कुछ धुआँ आख़िरश और बस मौत तक ज़िंदगी का सफ़र रात-दिन कश्मकश और बस पी गया पेड़ आँधी मगर गिर पड़ा खा के ग़श और बस ज़िंदगी जलती सिगरेट है सिर्फ़ दो-चार कश और बस सूखते पेड़ की लकड़ियाँ आख़िरी पेशकश और बस

Sandeep Thakur

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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आँख की खिड़कियाँ खुली होंगी दिल में जब चोरीयाँ हुई होंगी या कहीं आइने गिरे होंगे या कहीं लड़कियाँ हँसी होंगी या कहीं दिन निकल रहा होगा या कहीं बस्तियाँ जली होंगी या कहीं हाथ हथकड़ी में क़ैद या कहीं चूड़ियाँ पड़ी होंगी या कहीं ख़ामुशी की तक़रीबात या कहीं घंटियाँ बजी होंगी लौट आएँगे शहर से भाई हाथ में राखियाँ बँधी होंगी उन दिनों कोई मर गया होगा जिन दिनों शादियाँ हुई होंगी

Tehzeeb Hafi

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अब मजीद उस सेे ये रिश्ता नहीं रखा जाता जिस से इक शख़्स का परदा नहीं रखा जाता एक तो बस में नहीं तुझ से मुहब्बत न करूँ और फिर हाथ भी हल्का नहीं रखा जाता पढ़ने जाता हूँ तो तस्में नहीं बांदे जाते घर पलटता हूँ तो बस्ता नहीं रखा जाता दर-ओ-दीवार पे जंगल का गुमाँ होता है मुझ से अब घर में परिंदा नहीं रखा जाता

Tehzeeb Hafi

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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ

Obaidullah Aleem

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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए

Obaidullah Aleem

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जो उस ने किया उसे सिला दे मौला मुझे सब्र की जज़ा दे या मेरे दिए की लौ बढ़ा दे या रात को सुब्ह से मिला दे सच हूँ तो मुझे अमर बना दे झूटा हूँ तो नक़्श सब मिटा दे ये क़ौम अजीब हो गई है इस क़ौम को ख़ू-ए-अम्बिया दे उतरेगा न कोई आसमाँ से इक आस में दिल मगर सदा दे बच्चों की तरह ये लफ़्ज़ मेरे माबूद इन्हें बोलना सिखा दे दुख दहर के अपने नाम लिक्खूँ हर दुख मुझे ज़ात का मज़ा दे इक मेरा वजूद सुन रहा है इल्हाम जो रात की हवा दे मुझ से मिरा कोई मिलने वाला बिछड़ा तो नहीं मगर मिला दे चेहरा मुझे अपना देखने को अब दस्त-ए-हवस में आईना दे जिस शख़्स ने उम्र-ए-हिज्र काटी उस शख़्स को एक रात क्या दे दुखता है बदन कि फिर मिले वो मिल जाए तो रूह को दिखा दे क्या चीज़ है ख़्वाहिश-ए-बदन भी हर बार नया ही ज़ाइक़ा दे छूने में ये डर कि मर न जाऊँ छू लूँ तो वो ज़िंदगी सिवा दे

Obaidullah Aleem

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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था

Obaidullah Aleem

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ऐसी तेज़ हवा और ऐसी रात नहीं देखी लेकिन हम ने मौला जैसी ज़ात नहीं देखी उस की शान-ए-अजीब का मंज़र देखने वाला है इक ऐसा ख़ुर्शीद कि जिस ने रात नहीं देखी बिस्तर पर मौजूद रहे और सैर-ए-हफ़्त-अफ़्लाक ऐसी किसी पर रहमत की बरसात नहीं देखी उस की आल वही जो उस के नक़्श-ए-क़दम पर सिर्फ़ ज़ात की हम ने आल-ए-सादात नहीं देखी एक शजर है जिस की शाख़ें फैलती जाती हैं किसी शजर में हम ने ऐसी बात नहीं देखी इक दरिया-ए-रहमत है जो बहता जाता है ये शान-ए-बरकात किसी के साथ नहीं देखी शाहों की तारीख़ भी हम ने देखी है लेकिन उस के दर के गदाओं वाली बात नहीं देखी उस के नाम पे मारें खाना अब एज़ाज़ हमारा और किसी की ये इज़्ज़त औक़ात नहीं देखी सदियों की इस धूप छाँव में कोई हमें बतलाए पूरी हुई कौन सी उस की बात नहीं देखी अहल-ए-ज़मीं ने कौन सा हम पर ज़ुल्म नहीं ढाया कौन सी नुसरत हम ने उस के हाथ नहीं देखी

Obaidullah Aleem

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