ghazalKuch Alfaaz

जुदा रहता हूँ मैं तुझ से तो दिल बे-ताब रहता है चमन से दूर रह के फूल कब शादाब रहता है अँधेरे और उजाले की कहानी सिर्फ़ इतनी है जहाँ महबूब रहता है वहीं महताब रहता है मुक़द्दर में लिखा कर लाए हैं हम बोरिया लेकिन तसव्वुर में हमेशा रेशम-ओ-कम-ख़्वाब रहता है हज़ारों बस्तियाँ आ जाएँगी तूफ़ान की ज़द में मिरी आँखों में अब आँसू नहीं सैलाब रहता है भले लगते हैं स्कूलों की यूनिफार्म में बच्चे कँवल के फूल से जैसे भरा तालाब रहता है ये बाज़ार-ए-हवस है तुम यहाँ कैसे चले आए ये सोने की दुकानें हैं यहाँ तेज़ाब रहता है हमारी हर परेशानी इन्ही लोगों के दम से है हमारे साथ ये जो हल्क़ा-ए-अहबाब रहता है बड़ी मुश्किल से आते हैं समझ में लखनऊ वाले दिलों में फ़ासले लब पर मगर आदाब रहता है

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है

Munawwar Rana

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वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है

Munawwar Rana

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मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है

Munawwar Rana

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छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है

Munawwar Rana

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ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे

Munawwar Rana

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