किसी को बनाने में क़िस्मत तो है ही मगर अपने हाथों में मेहनत तो है ही ये मुमकिन है तुझ को हुनर देख चुन लें वगरना तो फिर ख़ूब-सूरत तो है ही निकल जाए बाहर ही ग़ुस्सा तो अच्छा कि फिर आप के घर में औरत तो है ही सभी लड़कियाँ छिप गई शाम ढलते कहो कुछ भी मर्दों की दहशत तो है ही
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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वो जब बंद कमरे में लटका हुआ था ये किस को पता था खिलाड़ी मोहब्बत में बिल्कुल नया था ये किस को पता था कि उन जाहिलों ने उसे आदमी की तरह भी न रक्खा मैं बचपन से जिस शख़्स को पूजता था ये किस को पता था मैं जब तक उसे जीत लेने की तैयारियाँ कर रहा था वो तब तक किसी और का हो चुका था ये किस को पता था
Kushal Dauneria
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हुस्न इक गुलसिताँ का माली है आँख शहतूत बदन डाली है मैं ने कुछ देर उदासी हँस कर मारी है मार नहीं डाली है साज-ओ-श्रृंगार से चमकाया बदन एक ही नोट वो भी जाली है
Kushal Dauneria
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जिस शाम उस को ट्रेन में बैठा के आया था मैं उस को उस के प्यार से मिलवा के आया था उस की बसी बसाई मैं दुनिया उजाड़ कर जो खा नहीं सका उसे फैला के आया था मेरे नसीब में कहीं बैठा तुम्हारा दुख लगता था जैसे माँ की क़सम खा के आया था
Kushal Dauneria
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बची है रौशनी जो भी चराग़ों से निकल जाए जो मेरे दिल से निकला है दु'आओं से निकल जाए हम ऐसे लोग जो दुश्मन के रोने पर ठहर जाएँ वो ऐसा शख़्स जो अपनों की लाशों से निकल जाए पढ़ाने का अगर मतलब है हाथों से निकल जाना ख़ुदाया फिर मिरी बेटी भी हाथों से निकल जाए वही इक शख़्स था मेरा यहाँ पर जी लगाने को उसी को चाहते थे सब कि गाँव से निकल जाए इधर तो छू रही है जिस्म मेरा ठंडे हाथों से उधर वो चाहती है रात बातों से निकल जाए नुमाइश बाप की दौलत की कर के सोचता था मैं कि शायद इम्तिहान-ए-इश्क़ पैसों से निकल जाए
Kushal Dauneria
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क्या हो कि मेरी ज़िंदगी से तू निकल सके जिस से कि मेरे दर्द का पहलू निकल सके दरकार इस लिए है मुझे दूसरा बदन उस की दिल-ओ-दिमाग़ से ख़ुशबू निकल सके सब अपनी अपनी लाशों को मंदिर में ले चलो शायद ख़ुदा की आँख से आँसू निकल सके गहरी हुईं जड़ें तो ये शाख़ें हरी हुईं पावँ जमें तो पेड़ के बाज़ू निकल सके मैं उस के बा'द सिर्फ़ इन्हीं कोशिशों में हूँ गर्दन से उस के नाम का टैटू निकल सके अपनी हथेलियों में ये आँखें निचोड़ लूँ मुमकिन है तेरे हिज्र से चुल्लू निकल सके मैं चाहता हूँ रात में सूरज-मुखी खिले मैं चाहता हूँ दिन में भी जुगनू निकल सके
Kushal Dauneria
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